Tuesday, February 18, 2014

Adesh Adesh

शिव आदेश

ॐ अलख निरंजन शिव को आदेश।

अविगत महापुरुष मूल पुरुष पुरुषोत्तम आद पुरुष शिव को आदेश। ज्योति-परमज्योति-अयोनि रूद्र शिव को आदेश।

शिव आदेश ॐ अलख निरंजन शिव को आदेश

शिव आदेश

ॐ अलख निरंजन शिव को आदेश।

अविगत महापुरुष मूल पुरुष पुरुषोत्तम आद पुरुष शिव को आदेश। ज्योति-परमज्योति-अयोनि रूद्र शिव को आदेश। विशूनी विश्वमूर्ति पाताल ग्रहणी शिव को आदेश। मुखेवेद पुराण नासिका गंगा - जमना - सरस्वती शिव को आदेश। ललाटी चंद मस्तके त्रिकुटा देवता धारी शिव को आदेश। नक्षत्री माला अठारह भार वनस्पती हृदय के तैतीस करोड़ देवता धारी शिव को आदेश। सेली सिंगी मीन मेखला बाघाम्बरधारी रोम - रोम सप्त सागरा शिव को आदेश। शिव के बायीं ओर निर्गुण ब्रहम् दाहिनी ओर शक्ति महामाया बीच में स्वयं पूर्ण अखण्ड   ज्योति स्वरूप शिव को आदेश। विभूति धारी बीज मंत्र घोर मंत्र अघोर मंत्र क्षीर मंत्र गायत्री मंत्र अभय जाप तंत्र - मंत्र स्वरूप शिव को आदेश। नर - नारी भूत - प्रेत यक्ष किन्नर इन्द्रादि देवता ब्रह्माण्ड व्यापक शिव को आदेश। साधु - संत योगी - ज्ञानी तपस्वी त्यागी अवधूत हर भक्त के ईष्ट शिव को आदेश। जीवों का आराध्या शिव को आदेश। सूक्ष्म में सूक्ष्म विराटों में व्यापक महातत्त्व शिव को आदेश। सृष्टि उत्पत्ति संहार पालन पंच महातत्त्व शिव को आदेश। चार खानी चार बानी चन्द सूर पवन पानी शिव को आदेश। चराचर सृष्टि का बिज शिव को आदेश। करोड़ों सूर्य प्रकाशनाथ योग आदर्श शिव को आदेश। परमात्मपूर्ण आनंद सर्व शक्तिमान चैतन्य रूप जितेन्द्र मोक्ष कैवल्य मुक्तिदाता भिन्न - अभिन्न शिव को आदेश। महाज्ञानी कृपा साक्षात्कार शिव को आदेश। सर्वनाथ सिद्धों का सतगुरु आदिनाथजि ॐकार शिव को आदेश। इतना शिव सबद निरूपा सम्पूर्ण भया। श्रीनाथजी गुरुजी को आदेश।

श्रीशंभुजती गुरु गोरखनाथ बाल स्वरूप बोलिए। इतना नौ नाथ स्वंरूप मंत्र सम्पूर्ण भया अनन्त कोट सिद्धों में बैठकर गुरु गोरखनाथजि ने कहाया नाथजी गुरुजी आदेश।








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Navnath Jhundi: According to conventions, the Navnath Jhundi began 9 lac and 103 years back along with the first journey on foot by 9 Naths and 84 Holy Men, because Parashuram kept his axe down on the ground after testing the divine incarnation of Lord Ram and went off to the forests to meditate. He started suffering from the guilt of making the earth devoid of Kshatriyas time and again. He wondered how to make amends for the huge number of human lives he had taken.
It was not correct to take human lives even after being gifted by God with the 4 arts. It was only Lord Shiva's right and responsibility to destroy life. So, in order to get mental peace, Parashuram started traveling and seeking the blessings of sages, ascetics and saints. All the sages and saints suggested him to go to Guru Gorakshnathji. He was the only one who could provide a solution to this.
Parashuram reached Kaligarh Mountain in search of Gorakshnathji and found Him on the Anupan Rock. Parashuram expressed all his grief and pain bowing down at the feet of Guru Gorakshnathji. Gorakshnathji ordered Parashuram to extend his hands and put Patra Devta in his hands. Patra Devta remained there for moments. Parashuram could not even sense when Patra Devta came in his hand. Then Guru Gorakshnathji told him to go and meditate in such a place where no one has ever meditated before and such a land that he has not donated to anyone. Parashuram went and tried. Then he came back to Guru Gorakshnath and said that he had not found such a place where no one has meditated before. Guru Shri Gorakshnath asked him to go facing the south. He would get such a land there. But he should keep walking without turning around. Parashuramji went on walking and reached the sea-shore. Then he started thinking that Guru Gorakshnathji had asked him not to turn around, but there was the sea ahead. He thought that perhaps Guru Gorakshnathji had asked him to make amends by drowning in the sea. He started walking towards the sea, and the sea started retreating backwards. The sea retreated 24 miles, and such a land came up where no one had ever meditated before. Parashuram established Patra Devta there and started a rigorous meditation. Guru Gorakshnathji was satisfied with that meditation and appeared from Patra Devta physically. The mist that loomed there, which is called Manju in the Kannada language, disappeared. Parashuram saw Guru Gorakshnathji. Since then, Guru Gorakshnathji started being called Manjunathji. Guru Shri Gorakhnathji emerged from the light and blessed Parashuram by telling him that all his killings had been made amends for by his meditation. Parashuram happily bowed to Gorakhnathji. At that time the Kumbh festival was happening at Tryambakeshwar (Nasik). 9 Naths and 84 Holy Men reached Anupan Rock in the Kumbh seeking Gorakhnathji's sight. There they did not find Guru Gorakhnathji. Then they came to know by their yogic powers that Guru Gorakshnathji was present at Parashuramji's meditation site in order to bless him. The 9 Naths and the 84 Holy Gurus assembled to seek Guru Shri Gorakhnathji's sight and reached from Tryambakeshwar to the place where Guru Shri Gorakhnathji had appeared as Manjunathji. Today, Mangalore is the place that exists in the name of Manjunath. After reaching there, everybody saw Guru Shri Gorakhnathji bowed at His feet. Guru Shri Gorakhnathji addressed Parashuramji and told him that his killings had been made amends for, but the earth will get rid of the sin of all those killings only if he touched the feet of the 9 Naths and the 84 Holy Men. Then Guru Shri Gorakhnathji addressed the 9 Naths and 84 Holy Men and told them that the Treta Yug was at its end and after it the Dwapar and KalYuga will come respectively with more sin spreading all across the world, and made them vow to come to that place walking at the end of every Sihasth, so that the world can get rid of the sins that have happened in the last 12 years and life can foster happily. Guru Gorakhnathji also said that He Himself would be present with them. Since then the "Jhundi" or group of 9 Naths and the 84 Holy Men have been undergoing this journey in every 12 years from the Sihasth Kumbh with the aspiration of getting the earth rid of sins. This journey is called the "Jhundi Yatra".
Adesh                                                      Adesh                                                                           Adesh 

Monday, June 27, 2011


Goraksha Gayatri Mantra

Ganesh Gayatri Mantra

Pran Gayatri Mantra

Kalastra Mantra

Dasmahavidya Mantra Jap

Dasmahavidya Mantra Jap

प्रथम ज्योति महाकाली प्रगटली |
ॐ निरन्जन निराकार अवगत पुरुष तत सार, तत सार मध्ये ज्योत ज्योत मध्ये परम ज्योत, परम ज्योत मध्ये उत्पन्न भई, माता शम्भु शिवानी काली, ओ काली काली महाकाली, कृष्ण वर्णी, शव वाहनी, रुद्र की पोषणी, हाथ खप्पर खडंग धारी, गले मुण्डमाल हंस मुखी | जिह्वा ज्वाला दन्त काली | मद्य मांस कारी श्मशान की रानी | मांस खाये रक्त - पी - पावे | भस्मन्ति माई जहां पर पाई तहां लगाई | सत की नाती धर्म की बेटी इन्द्र की साली काल की काली जोग की जोगिन, नागों की नागिन मन माने तो संग रमाई नहीं तो श्मशान फिरे अकेली ४ वीर अष्ट भैरी, घोर काली अघोर काली अजर बजर अमर काली भख जून निर्भय काली बला भख, दुष्ट को भख, काल भख पापी पाखण्डी को भख जती सती को रख, ओं काली तुम बाला ना वृद्धा, देव न दानव, नर या नारी देवीजी तुम तो हो परब्रह्मा काली |
क्रीं क्रीं क्रीं हूँ हूँ ह्रीं ह्रीं दक्षिणे हूँ हूँ ह्रीं ह्रीं क्रीं क्रीं क्रीं स्वाहा,

द्वितीय ज्योति तारा त्रिकुटा तोतला प्रगटी |
ॐ आदि योग अनादि माया जहां पर ब्रह्माण्ड उत्पन्न भया | ब्रह्माण्ड समाया आकाश मण्डल तारा त्रिकुटा तोतला माता तीनों बसै ब्रह्म कपालि, जहां पर ब्रह्मा विष्णु महेश उत्पत्ति, सूरज मुख तपे चंद्र मुख अमिरस पीवे, अग्नि मुख जले, आद कुंवारी हाथ खङग गल मुण्ड माल, मुर्दा मार ऊपर खड़ी देवी तारा | नीली काया पीली जटा, काली दन्त जिह्वा दबाया | घोर तारा अघोर तारा, दूध पूत का भण्डार भरा | पंच मुख करे हा हा ऽ:ऽ:कारा, डांकनी शाकिनी भूत पलिता सौ सौ कोस दूर भगाया | चंडी तारा फिरे ब्रह्मांडी तुम तो हों तीन लोक की जननी |
ॐ ह्रीं श्रीं फट्, ओं ऐं ह्रीं श्रीं हूं फट् |

तृतीय ज्योति त्रिपुर सुन्दरी प्रगटी |
(षोडशी - त्रिपुर सुन्दरी)
ॐ निरन्जन निराकार अवधू मूल द्वार में बन्ध लगाई पवन पलटे गगन समाई, ज्योति मध्ये ज्योत ले स्थिर हो भई ॐ मध्या: उत्पन्न भई उग्र त्रिपुरा सुन्दरी शक्ति आवो शिवघर बैठो, मन उनमन, बुध सिद्ध चित्त में भया नाद | तीनों एक त्रिपुर सुन्दरी भया प्रकाश | हाथ चाप शर धर एक हाथ अंकुश | त्रिनेत्रा अभय मुद्रा योग भोग की मोक्षदायिनी | इडा पिंगला सुषुम्ना देवी नागन जोगन त्रिपुर सुन्दरी | उग्र बाला, रुद्र बाला तीनों ब्रह्मपुरी में भया उजियाला | योगी के घर जोगन बाला, ब्रह्मा विष्णु शिव की माता |
श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौं ह्रीं श्रीं कं एईल
ह्रीं हंस कहल ह्रीं सकल ह्रीं सो:
ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं

चतुर्थ ज्योति भुवनेश्वरी प्रगटी |
ॐ आदि ज्योत आनादि ज्योत, ज्योत मध्ये परम ज्योत - परम ज्योत मध्ये शिव गायत्री भई उत्पन्न, ॐ प्रात: समय उत्पन्न भई देवी भुवनेश्वरी | बाला सुन्दरी कर धर वर पाशांकुश अन्न्पुर्णी दुधपूत बल दे बालका ऋद्धि सिद्धि भण्डार भरे, बालकाना बल दे जोगी को अमर काया | १४ भुवन का राजपाट संभाला कटे रोग योगी का, दुष्ट को मुष्ट, काल कन्टक मार | योगी बनखण्ड वासा, सदा संग रहे भुवनेश्वरी माता |

पंचम ज्योति छिन्नमस्ता प्रगटी |
सत का धर्म सत की काया, ब्रह्म अग्नि में योग जमाया | काया तपाये जोगी (शिव गोरख) बैठा, नाभ कमल पर छिन्नमस्ता, चन्द्र सूर में उपजी सुषुम्नी देवी, त्रिकुटी महल में फिरे बाला सुन्दरी, तन का मुन्डा हाथ में लीन्हा, दाहिने हाथ में खप्पर धार्या | पी पी पीवे रक्त, बरसे त्रिकुट मस्तक पर अग्नि प्रजाली, श्वेत वर्णी मुक्त केशा कैची धारी | देवी उमा की शक्ति छाया, प्रलयी खाये सृष्टि सारी | चण्डी, चण्डी फिरे ब्रह्माण्डी भख भख बाला भख दुष्ट को मुष्ठ जाती, सती को रख, योगी घर जोगन बैठी, श्री शम्भुजती गोरखनाथ जी ने भाखी | छिन्नमस्ता जपो जाप, पाप कन्ट्न्ते आपो आप जो जोगी करे सुमिरण पाप पुण्य से न्यारा रहे | काल ना खाये |
श्रीं क्लीं ह्रीं ऐं वज्र वैरो चनीये हूँ हूँ फट् स्वाह: |

षष्टम् ज्योति भैरवी प्रगटी |
ॐ सती भैरवी भैरो काल यम जाने यम भूपाल तीन नेत्र तारा त्रिकुटी, गले में माला मुण्डन की | अभय मुद्रा पीये रुधिर नाशवन्ती ! काला खप्पर हाथ खन्जर, कालापीर धर्म धूप खेवन्ते वासना गई सातवे पाताल, सातवे पाताल मध्ये परमतत्व परमतत्व में जोत, जोत में परम जोत, परम जोत में भई उत्पन्न काल भैरवी, त्रिपुर भैरवी, समपत प्रदा भैरवी, कैलेश भैरवी, सिद्धा भैरवी, विध्वंसिनि भैरवी, चैतन्य भैरवी, कामेश्वरी भैरवी, षटकुटा भैरवी, नित्या भैरवी | जपा अजपा गोरक्ष जपन्ती यही मंत्र मत्स्येन्द्रनाथ जी को सदा शिव ने कहायी | ऋद्ध फूरो सिद्ध फूरो सत श्री शम्भुजती गुरु गोरक्षनाथ जी अनन्त कोटि सिद्धा ले उतरेगी काल के पार, भैरवी भैरवी खड़ी जिन शीश पर, दूर हाटे काल जन्जाल भैरवी अमंत्र बैकुण्ठ वासा | अमर लोक में हुवा निवासा |
"ॐ हस्त्रो हस्कलरो हस्त्रो:" |

सप्तम ज्योति धूमावती प्रगटी |
ॐ पाताल निरन्जन निराकार, आकाश मण्डल धुन्धुकार, आकाश दिशा से कौन आई, कौन रथ कौन असवार, आकाश दिशा से धूमावंती आई, काक ध्वजा का रथ अस्वार थरै धरत्री थरै आकाश, विधवा रुप लम्बे हाथ, लम्बी नाक कुटिल नेत्र दुष्टा स्वभाव, डमरु बाजे भद्रकाली, क्लेश कलह कालरात्रि | डंका डंकनी काल किट किटा हास्य करी | जीव रक्षन्ते जीव भक्षन्ते जाया जीया आकाश तेरा होये | धूमावन्तीपुरी में वास, न होती देवी न देव तहाँ न होती पूजा न पाती तहाँ न होती जात न जाती तब आये श्री शम्भुजती गुरु गोरक्षनाथ आप भयी अतीत |
ॐ धूं: धूं: धूमावती फट् स्वाह: |

अष्ठम ज्योति बगलामुखी प्रगटी |
ॐ सौ सौ सुता समुन्दर टापू, टापू में थापा सिंहासन पीला | सिंहासन पीले ऊपर कौन बैसे सिंहासन पीला ऊपर बगलामुखी बैसे, बगलामुखी के कौन संगी कौन साथी | कच्ची बच्ची काक - कुतीया - स्वान चिड़िया, ॐ बगला बाला हाथ मुग्दर मार, शत्रु ह्रदय पर स्वार तिसकी जिव्हा खिच्चै बाला | बगलामुखी मरणी करणी उच्चाटन धरणी, अनन्त कोटि सिद्धों ने मानी ॐ बगलामुखी रमे ब्रह्माण्डी मण्डे चन्द्र्सूर फिरे खण्डे खण्डे | बाला बगलामुखी नमो नमस्कार |
ॐ हृलीं ब्रह्मास्त्रायैं विदमहे स्तम्भनबाणायै
धीमहि तन्नो बगला प्रचोदयात्

नवमी ज्योति मातंगी प्रगटी |
ॐ गुरूजी शून्य शून्य महाशून्य, महाशून्य में ओंकार ॐकार में शिवम् शिवम् में शक्ति - शक्ति अपन्ते उहज आपो आपना, सुभय में धाम कमल में विश्राम, आसन बैठी, सिंहासन बैठी पूजा पूजो मातंगी बाला, शीश पर शशी अमिरस प्याला हाथ खड्ग नीली काया | बल्ला पर अस्वारी उग्र उन्मत मुद्राधारी, उद गुग्गुल पाण सुपारी, खीरे खाण्डे मद्य मांसे घृत कुण्डे सर्वांगधारी | बुन्द मात्रेन कडवा प्याला, मातंगी माता तृप्यन्ते तृप्यन्ते | ॐ मातंगी सुन्दरी, रुपवंती, कामदेवी, धनवंती, धनदाती, अन्नपूर्णी अन्न्दाती, मातंगी जाप मंत्र जपे काल का तुम काल को खाये | तिसकी रक्षा शम्भुजती गुरु गोरक्षनाथ जी करे |
ॐ ह्री क्लीं हूँ मातंग्यै फट् स्वाहा |

दसवीं ज्योति कमला प्रगटी |
ॐ अयोनी शंकर ॐकार रुप, कमला देवी सती पार्वती का स्वरुप | हाथ में सोने का कलश मुख से अभय मुद्रा | श्वेत वर्ण सेवा पूजा करे, नारद इन्द्रा | देवी देवत्या ने किया जय ओंकार | कमला देवी पूजो केशर पान सुपारी, चकमक चीनी फतरी तिल गुग्गल सहस्त्र कमलों का किया हवन | कहे गोरख, मंत्र जपो जाप जपो ऋद्धि सिद्धि की पहचान गंगा गौरजा पार्वती जान | जिसकी तीन लोक में भया मान | कमला देवी के चरण कमल को आदेश |
ॐ ह्रीं क्लीं कमला देवी फट् स्वाह:
सुनो पार्वती हम मत्स्येन्द्र पूता, आदिनाथ नाती, हम शिव स्वरुप उलटी थापना थापी योगी का योग, दस विद्या शक्ति जानो, जिसका भेद शिव शंकर ही पायो | सिद्ध योग मरम जो जाने विरला तिसको प्रसन्न भयी महाकालिका | योगी योग नित्य करे प्रात: उसे वरद भुवनेश्वरी माता | सिद्धासन सिद्ध, भया श्मशानी तिसके संग बैठी बगलामुखी | जोगी खड दर्शन को कर जानी, खुल गया ताला ब्रह्माण्ड भैरवी | नाभी स्थाने उडीय्यान बांधी मनीपुर चक्र में बैठी, छिन्नमस्ता रानी | ॐकार ध्यान लाग्या त्रिकुटी, प्रगटी तारा बाला सुन्दरी | पाताल जोगन (कुण्डलिनी) गगन को चढ़ी, जहाँ पर बैठी त्रिपुर सुन्दरी | आलस मोड़े, निन्द्रा तोड़े तिसकी रक्षा देवी धूमावंती करें | हंसा जाये दसवें द्वारे देवी मातंगी का आवागमन खोजे | जो कमला देवी की धूनी चेताये तिसकी ऋद्धि सिद्धि से भण्डार भरे | जो दशविद्या का सुमिरण करे | पाप पुन्य से न्यारा रहे | योग अभ्यास से भये सिद्धा आवागमन निवराते | मन्त्र पढ़े सो नर अमर लोक में जायें | इतना दस महाविद्या मन्त्र जाप सम्पूर्ण भया | अनन्त कोट सिद्धों में, गोदावरी त्र्यम्बक क्षेत्र अनुपान शिला, अवलगढ़ पर्वत पर बैठ श्री शम्भुजती गुरु गोरक्षनाथ जी ने पढ़ कथ कर सुनाया श्री नाथजी गुरूजी को आदेश | आदेश |
ॐ शिव गोरक्ष योगी

Aadesh Gayatri Jaap

आदेश गायत्री जाप
ॐ नम आदेश गुरान्जीकूँ आदेश , ॐ आदेशाय विद्महे |
सोहं आदेशाय धीमहि नन्नो आदेशनाम प्रचोदयात् ||
आदेश नाम गायत्री जाप उठन्ते अनुभवदेवा |
सप्त दीप नव खण्डमें आदेश नामकी सेवा ||
आदेश नाम अनघड़की काया ररंकारमें झंकार समाया |
सोहंकारसे ॐ उपाया वज्र शरीर अमर करी काया ||
आदेश नाम अमृत रसमेवा आद जुगाद करूँ मै सेवा |
आदेश नाम अनघड़जीने भाख्या लख चौरासी पड़ता राख्या ||
आदेश नाम पाखान तराई आदेश नाम जपोरे भाई |
आदेश नाम जपन्ते देवा व्रह्मा विष्णु महेश्वर एवा ||
सिद्ध चौरासी नाथ नव जोगी आवा गमन कदे नहि भोगी |
राजा प्रजा जपै दिन राति दूध पूत घर संपति आति ||
आदेश नाम गायत्री सार जपो भौ उतरो पार |
आदेश नाम गायत्री उत्तम जपतांवार न कीजै जनम ||
इतना आदेश नाम गायत्री जाप सम्पूरणं सही |
अटल दलीचे वैठके श्रीनाथजी गुरुजी ने कही ||
नाथजी गुरुजी को आदेश आदेश ||

नौनाथरक्षा जाप
Nau Nath Raksha Jaap
ॐ अवधूनाथ गोरष आवे, सिद्ध बाल गुदाई |
घोड़ा चोली आवे, आवे कन्थड़ वरदाई || १ ||
सिध कणेरी पाव आवे, आवे औलिया जालंधर |
अजै पाल गुरुदेव आवे, आवे जोगेसर मछंदर || २ ||
धूँधलीमल आवे, आवे गोपिचन्द निजततगहणा |
नौनाथ आवो सिधां सहत महाराजै !
मुझ रक्षा करणा || ३ ||

Ram Raksha Mantra Jaap
वोउं सीस राखै सांइयां श्रवण सिरजन हार |
नैनूं राषै निरहरी नासा अपरं पार || १ ||
मुख रक्षा माधवै कण्ठ रक्षा करतार |
हृदै हरि रक्षा करै नाभी त्रिभवण सार || २ ||
जांघ रक्षा जगदीसकी पीडी पालन हार |
गिर रक्षा गोविन्दकी पगतलि परम उदार || ३ ||
आगै राषै रामजी पीछै राषण हार |
बांम दाहिणै राषिलै कर ग्रही करतार || ४ ||
जम डँक लागै नहीं विघनकालभै दूर |
राम रक्षा जनकी करै वाजै अन हद तूर || ५ ||
कलेजो राषै केसवो जिभ्याकूं जगदीस |
आतमकूं अलष राषै जीवकूं जोतिसरूप || ६ ||
राष राष सरनागति जीवकूं अवकी वार |
साधांकी रक्षा करै श्रीगोरष सतगुरु सिरजन हार || ७ ||

Goraksha Panchakshar Jaap
गोरषनाथ लिंवस्वरूपं गउ गो प्रतिपालनं |
अगोचरं गहर गभीरं गकाराइ न्मो न्मो || १ ||
रहतंच निरालंबं अस्थंभं भवनं त्रियं |
राष राष श्रव भूतानं रकाराइ न्मो न्मो || २ ||
षकार इकयिस व्रह्मांडं षेचरं जगद गुरुं |
षेत्रपालं षडग वंसे षकाराइ न्मो न्मो || ३ ||
नाना सास समो दाइ नाना रूप प्रकासितं |
नाद विंद समो जोति नकाराइ न्मो न्मो || ४ ||
थापितं थल संसारं अलेषं अपारं अगोचरं |
थावरे जंगमे सचिवं थकाराइ न्मो न्मो || ५ ||
गकारं ग्यान संयुक्तं रकारं रूप लाछ्नं |
षकारं इकीस व्रह्मंडं नकारं नादि विंदए || ६ ||
थाकारं थानमानयो थिर थापन थर्पनं |
गोरषनाथ अक्षरं मंत्रं श्रवाधाराइ न्मो न्मो || ७ ||
ॐ गों गोराक्षनाथाय विद्महे शून्यपुत्राय धीमहि तन्नो
गोरक्ष निरंजनः प्रचोदयात् | आदेश आदेश शिवगोरक्ष ||
गोरक्षवालं गुरु शिष्यपालं शेषाहिमालं शशिखण्ड भालम |
कालस्यकालं जितजन्मजालं वन्दे जटालं जगदब्ज नालं ||

Shree Bala Jaap Beej Mantra

श्रीबाला जाप बीजमंत्र
ॐ नमो आदेश गुरूजी कौं, आदेश ॐ गुरूजी -
ॐ सोहं ऐं क्लीं श्री सुन्दरी बाला
काहे हात पुस्तक काहे हात माला |
बायें हात पुस्तक दायें हात माला जपो तपो श्रीसुन्दरी बाला |
जिवपिण्डका तूं रखवाला हंस मंत्र कुलकुण्डली बाला |
बाला जपे सो बाला होय बूढा जपे सो बाला होय ||
घट पिण्डका रखवाला श्रीशंभु जति गुरु गोरख बाला |
उलटंत वाला पलटंत काया सिद्धोंका मारग साधकोंने पाया ||
ॐ गुरूजी, ॐ कौन जपंते सोहं कौन जपंते ऐं कौन जपंते |
क्लीं कौन जपंते श्रीसुन्दरी कौन जपंते बाला कौन जपंते ||
ॐ गुरूजी, ॐ जपंते भूचरनाथ अलख अगौचर अचिंत्यनाथ |
सोहं जपंते गुरु आदिनाथ ध्यान रूप पठन्ते पाठ ||
ऐ जपंते व्रह्माचार वेद रूप जग सरजन हार |
क्लीं जपंते विष्णु देवता तेज रूप राजासन तपता ||
श्रीसुन्दरी पारवती जपन्ती धरती रूप भण्डार भरन्ती |
बाला जपंते गोरख बाला ज्योति रूप घट घट रखवाला ||
जो वालेका जाने भेव आपहि करता आपहि देव |
एक मनो कर जपो जाप अन्तवेले नहि माई बाप ||
गुरु सँभालो आपो आप विगसे ज्ञान नसे सन्ताप |
जहां जोत तहाँ गुरुका ज्ञान गतगंगा मिल धरिये ध्यान ||
घट पिण्डका रखवाला श्रीशंभु जति गुरु गोरख बाला |
जहां बाला तहां धर्मशाला सोनेकी कूची रुपेका ताला ||
जिन सिर ऊपर सहंसर तपई घटका भया प्रकाश |
निगुरा जन सुगुरा भया कटे कोटि अघ राश ||
सुचेत सैन सत गुरु लखाया पडे न पिण्ड विनसे न काया |
सैन शब्द गुरु कन्हें सुनाया अचेत चेतन सचेत आया ||
ध्यान स्वरूप खोलिया ताला पिण्ड व्रह्माण्ड भया उजियाला |
गुरु मंत्र जाप संपूरण भया सुण पारवती माहदेव कह्ना ||
नाथ निरंजन नीराकार बीजमंत्र पाया तत सार |
गगन मण्डल में जय जय जपे कोटि देवता निज सिर तपे ||
त्रिकुटि महल में चमका होत एकोंकार नाथ की जोत |
दशवें द्वार भया प्रकाश बीजमंत्र, निरंजन जोगी के पास ||
ॐ सों सिद्धोंकी माया सत गुरु सैन अगम गति पाया |
बीज मंत्र की शीतल छाया भरे पिण्ड न विनसे काया ||
जो जन धरे बाला का ध्यान उसकी मुस्किल ह्नोय आसान |
ॐ सोहं एकोंकार जपो जाप भव जल उतरो पार ||
व्रह्मा विष्णु धरंते ध्यान बाला बीजमंत्र तत जान |
काशी क्षेत्र धर्म का धाम जहां फूक्या सत गुरने कान ||
ॐ बाला सोहं बाला किस पर बैठ किया प्रति पाला |
ऋद्ध ले आवै सुण्ढ सुण्ढाला हित ले आवै हनुमत बाला ||
जोग ले आवे गोरख बाला जत ले आवे लछमन बाला |
अगन ले आवे सूरज बाला अमृत ले आवे चन्द्रमा बाला ||
बाला वाले का धर ध्यान असंख जग की करणी जान |
मंगला माई जोत जगाई त्रिकुटि महल में सुरती पाई ||
शिव शक्ति मिल वैठे पास बाला सुन्दरी जोत प्रकाश |
शिव कैलास पर थापना थापी व्रह्मा विष्णु भरै जन साखी ||
बाला आया आपहि आप तिसवालेका माइ न बाप |
बाला जपो सुन्न महा सुन्न बाला जपो पुन्न महा पुन्न ||
बाला जपो जोग कर जुक्ति बाला जपो मोक्ष महा मुक्ति |
बाला बीज मंत्र अपार बाला अजपा एकोंकार ||
जो जन करे बाला की सेव ताकौं सूझे त्रिभुवन देव |
जो जन करे बाला की भ्राँत ताको चढे दैत्यके दाँत ||
भरम पडा सो भार उठावै जहाँ जावै तहाँ ठौर न पावै |
धूप दीप ले जोत जगाई तहाँ वैठी श्री त्रिपुरा माई ||
ऋद्ध सिद्ध ले चौक पुराया सुगुरा जन मिल दर्शन पाया |
सेवक जपै मुक्ति कर पावै बीज मंत्र गुरु ज्ञान सुहावै ||
ॐ सोहं सोधन काया गुरु मंत्र गुरु देव बताया |
सव सिद्धनके मुखसे आया सिद्ध वचन निरंजन ध्याया ||
ओवं कारमें सकल पसारा अक्षय जोगि जगतसे न्यारा |
श्री सत गुरु गुरुमंतर दीजै अपना जन अपना कर लीजै ||
जो गुरु लागा सन्मुख काना सो गुरु हरि हर व्रह्मा समाना |
गुरु हमारे हरके जागे अरज करूं सत गुरुके आगे ||
जोत पाट मैदान रचाया सतसे ल्याया धर्मसे विठाया |
कान फूक सर जीवत कीया सो जोगेसर जुग जुग जीया ||
जो जन करे बालाकी आसा सो पावै शिवपुरिका वास |
जपिये भजिये श्रीसुन्दरी बाला आवा गवन मिटे जंजाला ||
जो फल मांगूँ सो फल होय बाला बीज मंत्र है सोय |
गुरु मंत्र संपूरण माला रक्षा करै गुरु गोरख वाला ||
सेवक आया सरणमें धन्या चरणमें शीष |
बालक जान कर कीजिये दयादृष्टि आशीष ||
गुरु हमारे हरके जागे नीवँ नीवँ नावूँ माथ |
वलिहारी गुरुर आपणे जिन दीपक दीना हाथ ||

Dukh Naashini Durgasttotram

दुःखनाशिनी दुर्गास्त्तोत्रं
ॐ पर्व्रह्मा स्वरूपां च वेड गर्भां जगन्मयीम |
शरण्ये त्वामहं वन्दे दुर्गां दुर्गति नाशिनीम || १ ||
कामाख्यां कामदां श्यामां कामरूपां मनोरमाम |
इश्वरीं त्वामहं वन्दे दुर्गां दुर्गति नाशिनीम ||
त्रिनेत्रां हास्य संयुक्तां सर्वालंकार भूषिताम |
विजयां त्वामहं वन्दे दुर्गां दुर्गति नाशिनीम || ३ ||
व्रह्मादिभिः स्तूयमानां सिद्ध गंधर्व सेविताम |
भवानीं त्वामहं वन्दे दुर्गां दुर्गति नाशिनीम ||
निशुंभ शुंभ मथनीं महिषासुर घातिनीम |
दिव्यरुपामहं वन्दे दुर्गां दुर्गति नाशिनीम || ५ ||
विंशत्यर्धभुजां देवीं शुद्ध कांचन सन्निभाम |
गौरी रुपामहं वन्दे दुर्गां दुर्गति नाशिनीम ||
त्रिशूलं खडगं चक्रं च वाणं शक्तिं परश्वधम |
दधानां त्वामहं वन्दे दुर्गां दुर्गति नाशिनीम || ७ ||
जगन्मयीं महाविद्यां सृष्टिसंहार कारिणीम |
सर्व दवमहं वन्दे दुर्गां दुर्गति नाशिनीम ||
इदं तु कवचं पुण्यं महामंत्रं महाफलम |
यः पठेन्मानवो नित्य मस्मद्भक्ति समन्वितः |
धनधान्यं प्रयच्छामि सकृदावर्त्तनेन तु || ९ ||

विश्वरक्षामंत्र जापः
Vishwa Raksha Mantra Jaap
या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेश्वलक्ष्मीः
पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः |
श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा
तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि ! विश्वम् ||
सौम्या सौम्यतराशेष सौम्येभ्यस्त्वति सुन्दरी |
परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी ||
सौम्यानि यानि रूपाणि त्रैलोक्ये विचरन्ति ते |
यानि चात्यर्थघोराणि तै रक्षास्मां स्तथा भुवम् ||

Ann Dev Ki Aarti Jaap
आरती है अन्नदेव तुम्हारी, जाते रहती गुरु काया हमारी |
आरती है अन्नदेव तुमारीजी || टेक ||
राजा प्रजा जोगी आसनधारी सेनकरत गुरु सेवा तुमारी || १ ||
देवी देवता व्रह्मा व्रह्मचारी, सेनकरत गुरु सेवा तुमारी || २ ||
पीर पेगंबर छत्रछत्रधारी सेनकरत गुरु सेवा तुमारी || ३ ||
भनत गोरषनाथ सुननेजाधारी देवनमे देव अन्न मुरारी
आरती है अन्नदेव तुमारीजी || ४ ||

विश्वरक्षामंत्र जापः
Vishwa Raksha Mantra Jaap
या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेश्वलक्ष्मीः
पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः |
श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा
तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि ! विश्वम् ||
सौम्या सौम्यतराशेष सौम्येभ्यस्त्वति सुन्दरी |
परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी ||
सौम्यानि यानि रूपाणि त्रैलोक्ये विचरन्ति ते |
यानि चात्यर्थघोराणि तै रक्षास्मां स्तथा भुवम् ||

Ann Dev Ki Aarti Jaap
आरती है अन्नदेव तुम्हारी, जाते रहती गुरु काया हमारी |
आरती है अन्नदेव तुमारीजी || टेक ||
राजा प्रजा जोगी आसनधारी सेनकरत गुरु सेवा तुमारी || १ ||
देवी देवता व्रह्मा व्रह्मचारी, सेनकरत गुरु सेवा तुमारी || २ ||
पीर पेगंबर छत्रछत्रधारी सेनकरत गुरु सेवा तुमारी || ३ ||
भनत गोरषनाथ सुननेजाधारी देवनमे देव अन्न मुरारी
आरती है अन्नदेव तुमारीजी || ४ ||

अथ गुरुमन्त्रः
Ath Guru Mantra
ॐ गुरुजी ! ओं सोऽहं अलियं कलियं तारा त्रिपुरा तोतला |
काहे हाथ पुस्तक ? काहे हाथ माला ?
बायें हाथ पुस्तक दायें हाथ माला |
जपो तपो श्रीसुन्दरी बाला |
रक्षा करै गुरुगोरक्षनाथ बाला |
जीव पिण्डका तूं रखवाला |
नाथजी गुरुजी आदेश आदेश ||

श्रीगुरुमन्त्रका माहात्म्य
Shree Guru Mantra Kaa Maahaatmya
ॐ गुरुजी ! ओं सोऽहं अलियं कलियं श्रीसुन्दरी बाला |
कौन जपन्ते ओं ? कौन जपन्ते सोऽहं ? कौन जपन्ते अलियं ? कौन जपन्ते कलियं ? कौन जपन्ते सुन्दरी ? कौन जपन्ते बाला ?
ओं जपन्ते निरन्जन निराकार अवगत सरुपी | सोऽहं जपन्ते माई पारवती महादेव ध्यान सरुपी | अलियं जपन्ते ब्रह्मा सरस्वती वेद सरुपी | कलियं जपन्ते धरतीमाता अन्नपूर्णेश्वरि | बाला जपन्ते श्रीशम्भुयति गुरुगोरक्षनाथ शिव सरुपी |
आ ओ सुन्दर आलं पूछे देह कौन कौक योगेश्वरा ? कौन कौन नगेश्वरा ? धाव धाव ईश्वरी ! धाव धाव महेश्वरी ! बायें हाथ पुस्तक | दाहिने हाथ माला | जपो तपो श्रीसुन्दरी गुरुगोरक्ष बाला |इतना बाला बीजमन्त्र सम्पूर्ण भया अनन्तकोटि सिद्धों में बैठकर श्रीशम्भुयति गुरु गोरक्षनाथजी ने नौनाथ चौरासी सिद्धों को पढ़ कथकर सुनाया सिद्धों ! गुरुपीरो ! आदेश आदेश ||

श्रीगुरुमन्त्रका द्वितीय माहात्म्य
Shree Guru Mantra Kaa Dvitiya Maahaatmya
ॐ गुरुजी ! पवनपर्वत ऊर्ध्वमुख कुआ सतगुरु आये निरंकार ब्रह्मा आये देखा कौन हाथ पुस्तक ? कौन हाथ माला ? बायें हाथ पुस्तक दाहिने हाथ माला जपो तपो शिवं सोऽहं सुन्दरी बाला | बाला जपे सो बाला होवे | बूढा जपे सो बाला होवे | योगी जपे सो निरोगी होय जपो जपन्त कटन्त पाप | अन्त बेले माई न बाप | गुरु संभालो आपो आप | इतना गुरुमन्त्र सम्पूर्णम् |

बाल योगी भये रूप लिए तब, आदिनाथ लियो अवतारों।
ताहि समे सुख सिद्धन को भयो, नाती शिव गोरख नाम उचारो॥
भेष भगवन के करी विनती तब अनुपन शिला पे ज्ञान विचारो।
को नही जानत है जग मे जती गोरखनाथ है नाम तुम्हारो ॥

सत्य युग मे भये कामधेनु गौ तब जती गोरखनाथ को भयो प्रचारों।
आदिनाथ वरदान दियो तब , गौतम ऋषि से शब्द उचारो॥
त्रिम्बक क्षेत्र मे स्थान कियो तब गोरक्ष गुफा का नाम उचारो ।
को नही जानत है जग मे जती गोरखनाथ है नाम तुम्हारो ॥

सत्य वादी भये हरिश्चंद्र शिष्य तब, शुन्य शिखर से भयो जयकारों।
गोदावरी का क्षेत्र पे प्रभु ने , हर हर गंगा शब्द उचारो।
यदि शिव गोरक्ष जाप जपे , शिवयोगी भये परम सुखारो।
को नही जानत है जग मे जती गोरखनाथ है नाम तुम्हारो ॥

अदि शक्ति से संवाद भयो जब , माया मत्सेंद्र नाथ भयो अवतारों।
ताहि समय प्रभु नाथ मत्सेंद्र, सिंहल द्वीप को जाय सुधारो ।
राज्य योग मे ब्रह्म लगायो तब, नाद बंद को भयो प्रचारों।
को नही जानत है जग मे जती गोरखनाथ है नाम तुम्हारो ॥

आन ज्वाला जी किन तपस्या , तब ज्वाला देवी ने शब्द उचारो।
ले जती गोरक्षनाथ को नाम तब, गोरख डिब्बी को नाम पुकारो॥
शिष्य भय जब मोरध्वज राजा ,तब गोरक्षापुर मे जाय सिधारो।
को नही जानत है जग मे जती गोरखनाथ है नाम तुम्हारो ॥

ज्ञान दियो जब नव नाथों को , त्रेता युग को भयो प्रचारों।
योग लियो रामचंद्र जी ने जब, शिव शिव गोरक्ष नाम उचारो ॥
नाथ जी ने वरदान दिया तब, बद्रीनाथ जी नाम पुकारो।
को नही जानत है जग मे जती गोरखनाथ है नाम तुम्हारो ॥

गोरक्ष मढ़ी पे तपस्चर्या किन्ही तब, द्वापर युग को भयो प्रचारों।
कृष्ण जी को उपदेश दियो तब, ऋषि मुनि भये परम सुखारो॥
पाल भूपाल के पालनते शिव , मोल हिमाल भयो उजियारो।
को नही जानत है जग मे जती गोरखनाथ है नाम तुम्हारो ॥

ऋषि मुनि से संवाद भयो जब , युग कलियुग को भयो प्रचारों।
कार्य मे सही किया जब जब राजा भरतुहारी को दुःख निवारो,
ले योग शिष्य भय जब राजा, रानी पिंगला को संकट तारो।
को नही जानत है जग मे जती गोरखनाथ है नाम तुम्हारो ॥

मैनावती रानी ने स्तुति की जब कुवा पे जाके शब्द उचारो।
राजा गोपीचंद शिष्य भयो तब, नाथ जालंधर के संकट तारो। ।
नवनाथ चौरासी सिद्धो मे , भगत पूरण भयो परम सुखारो।
को नही जानत है जग मे जती गोरखनाथ है नाम तुम्हारो ॥

दोहा :- नव नाथो मे नाथ है , आदिनाथ अवतार ।
जती गुरु गोरक्षनाथ जो , पूर्ण ब्रह्म करतार॥
संकट -मोचन नाथ का , सुमरे चित्त विचार ।
जती गुरु गोरक्षनाथ जी मेरा करो निस्तार ॥

अल्लख निरंजन ॥ आदेश ॥
ॐ र्हीम र्हाम रक्ष रक्ष शिव गोरक्ष ॥


नाथ पंथी धुप मंत्र

ॐ नमो आदेश. गुरूजी को आदेश. ॐ गुरूजी. पानी का बूंद, पवनका थम्ब, जहा
उपजा कल्प वृक्ष का कंध।
कल्पवृक्ष वृक्ष को छाया । जिसमे तिल घुसले के किया वास।
धुनी धूपिया अगन चढाया, सिद्ध का मार्ग विरले पाया।
उरध मुख चढ़े अगन मुख जले होम धुप वासना होय ली, l
एकिस ब्रह्मंडा तैतीस करोड़, देवी देव कुन होम धुप वास।
सप्तमे पटल नव्कुली नाग , वसुक कुन होम घृत वास।
श्री नाथाजी की चरण कम पादुका कुन होम धुप वास।
अलील अनद धर्मं राजा धर्मं गुरु देव कुन होम धुप वास।
धरतरी अकास पवन पानी कुन होम धुप वास।
चाँद सूरज कूं होम धुप वास ,
तारा ग्रह नक्षत्र कूं होम धुप वास।
नवनाथ चौरासी सिद्ध कूं होम धुप वास।
अग्नि मुख धुप पवन मुख वास।
वासना वासलो थापना थाप्लो जहाँ धुप तह देव।
जहा देव तह पूजा . अलख निरंजन और न दूजा।
इति मंत्र पढ़ धुप ध्यान करे सो जोगी अमरपुर तारे।
बिना मंत्र धुप ध्यान करे खाय जरे न वाचा फुरे।
इतना धुप का मंत्र जप संपूर्ण सही। ।
अनंत कोट सिद्ध मे श्री नाथजी कही,
नाथजी गुरूजी कूं आदेश आदेश, , ,


गोरक्ष गुरु स्तोत्र

गुरु गुनालय परा , परा धी नाथ सुन्दरा , गुरु देवादिका हुनी वरिष्ठ तूची एक साजिरा

गुना वतार तू धरोनिया जगासी तारिसी , सुरा मुनीश्वरा अलभ्य या गतीसी तारिसी ,

जया गुरुत्व बोधिले तयासी कार्य सधिले , भवार्णवासी लंघिले सुविघ्न दुर्गा भंगीले ,

सहा रिपुन्शी जिंकिले निजात्म तत्त्व चिंतिले , परातपराशी पाहिले
प्रकृष्ट दुख साहिले,

गुरु उदार माउली , प्रशांत सौख्य साउली , जया नरसी पाउली , तयासी सिद्धि गावली

गुरु गुरु गुरु गुरु म्हणोनी जो स्मरे नरु , तरोनी मोह सागरु सुखी घडे निरंतरू,

गुरु चिदब्धि चंद्र हा , महत्पदी महेंद्र हा , गुरु प्रताप रुद्र हा ,
गुरु कृपा समुद्र हा ,

गुरु स्वरुप दे स्वता, गुरुची ब्रह्म सर्वथा , गुरु विना महा व्यथा नसे
जनी निवारिता
शिवा हुनी गुरु असे अधिक मला दिसे , नरासी मोक्ष द्यावया गुरु स्वरुप घेतसे
शिव स्वरुप अपुले न मोक्ष देखिले , गुरुत्व सर्व घेतले म्हणोनी कृत्य साधीले ,


शिव गोरक्ष बावनी ॥

शिव गोरक्ष शुभनाम को रटते शेष महेश॥
सरस्वती पूजन करे वंदन करे गणेश॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को रटे जो मन दिन रात॥
आवागमन को भेट के मनवांछित फल पात॥
शिव गोरक्ष शुभनाम से हुए है सिद्ध सुजन॥
नाम प्रभाव से मिट गया लोभ क्रोध अभिमान॥
शिव गोरक्ष शुभनाम से हो जाओ भावः पार॥
कलिकाल में है बड़ा सुंदर खेवन हार॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है जिसने लिया चित्तलय ॥
अश्त्ता सिद्धि नवनिधि मिली, अंत में अमर कहे ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम में शक्ति अपरम्पार ॥
लेत ही मिट जाट है अन्तर के अन्धकार ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है रटे जो निष् दिन जिव ॥
नश्वर यह तन छोड़ के जिव बनेगा शिव॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को मन तू रट ले अघाय
काहे को चंचल भया जैसे पशु हराय॥
शिव गोरक्ष शुभनाम में निष् दिन कर तू वास॥
अशुभ कर्म सब छूट है सत्य का होगा भास॥

शिव गोरक्ष शुभनाम में शक्ति भरी अगाध॥
लेने से ही तर गए नीच कोटि के व्याध ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को जो धरे अन्तर बिच॥
सबसे ऊँचा होत है भले होया वह नीच ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम में करे जो नर अति प्रेम ॥
उसको नही करना पड़े पूजा व्रत जप नेम ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को रटे जो बारम्बार
सहजही में हो जायेंगे भावः सिन्धु से पार।
शिव गोरक्ष शुभनाम से सिख लेव अद्वैत।
मेरा तेरा छोड़ दो तजो सका ये द्वैत ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को रत्ना आठो यम् ॥
आख़िर में यह आएगी मोदी तुमको कम
शिव गोरक्ष शुभनाम में शक्ति भरी अथाह॥
रटने वालो को मिला भावः सिन्धु का थाह॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को पहिचान जयदेव
यह दुस्सह संसार से तर गए वो तट खेव॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को रसना रट तू हमेश॥
वृथा नही बकवाद कर पल पल काहे आदेश॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को रतल तू चिट्टा लाया
घोर कलि से बचने का एक यही उपाय ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को मन तू रट दिन रात ॥
झूट प्रपंच को त्याग दे छोड़ जगत की बात॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को रसना कर तू याद॥
काहे स्वार्थ में भूल के वृथा करत बद्कवाद॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को मन तू रट दिन रैन ॥
कभू न खली जन दे एक भी तेरा बैन॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को सुमिरे कोटि संत॥
श्री नाथ कृपा से हो गया जन्म मरण का अंत
शिव गोरक्ष शुभनाम है निर्मल पवन गंग
रटने से रहती है सदा सदा रिद्धि सिद्धि सब संग॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है जैसा पूनम चाँद ॥
रटते है निशदिन उन्हें राम कृष्ण गोविन्द ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है जैसा गंगा नीर ॥
रट के उतरे कोटि जन भावः सागर के तीर॥
शिव गोरक्ष शुभनाम में जो जन करते आस
निश्चय वो तो जाट है अलख पुरूष के पास ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है जैसे सुंदर आम ॥
रटने से ही हो गया अमर जगत में नाम ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम में जैसे दीप प्रकाश॥
नित रटने से होत है अलख पुरूष का भास ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है उदधि तरन को जहाज ॥
रटने से हो गया है अमर भरतरी राज ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है जैसे सूर्य किरण ॥
रतल जिव तू प्रेम से चाहे जो सिन्धु तरन ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है निर्मल और विशुधा ॥
रटने से शुदा होत है होया जो जिव अशुधा ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है अमर सुधा रस बिन्द॥
पिने से हो गए है अजर अमर गोपीचंद ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है रटे अनेको राज ॥
जरा मरण का भय मिटा सुधरे सबके काज॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को रता है पूरण मल ॥
आधी व्याधि मिट गई जन्म मरण गया टल॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को रटते चतुर सुजन
अन्तर तिमिर विनाश हो उपजत है शुध्हा ज्ञान ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है सुंदर उज्जवल भान ॥
रटने वालो को कभी होवे नही कुछ हान॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को परस पत्थर जान ॥
जिव रूपी इस लोह को करते स्वर्ण समान ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को जानो सुर तरु वर ॥
रटने से मिल जाट है जिव को इच्छित वर ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को रटते कोटिक संत
नाम प्रताप से कट गया चौरासी का फंद ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम का बहुत बड़ा है पर्व ॥
जिसको है रटते सदा सुर नर मुनि गन्धर्व ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को रटते श्री हनुमान
भक्तो में हुए अग्रगण्य देवो में मिला मान ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को रटे जो जिव अज्ञान
नाभि प्रताप से होत है निश्चय चतुर सुजान॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है जैसे निर्मल जल ॥
प्रेम लगा रटते रहो क्षण क्षण और पल ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है कलि तरन हार ॥
रटने वालो के लिए खुला है मोक्ष का द्वार॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है जैसा स्वच्छा आकाश ॥
रटने वालो को बना लेते है निज दास॥

शिव गोरक्ष शुभनाम है अग्ने अपो आप ॥
रटने वालो को सभी जल जाते है पाप ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है अमर सुधारस बिन्दु ॥
पिने से तर जाट है सहज ही में भावः सिन्धु ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम की महिमा अपरम्पार ॥
कृपा सिन्धु की बिन्दु को कार्ड भावः से पार ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को बंदन करू हज़ार ॥
कृपा करो त्रिलोक पार करदो भावः से पार ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को प्रेम सहित आदेश ॥
ऐसी कृपा करो प्रभु रहे नही कुछ शेष ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को कोटि करू आदेश॥
करके कृपा मिटाइए जन्म मरण का क्लेश॥

ॐ शिव गोरक्ष अल्लख निरंजन आदेश ।
गोरक्ष बालम गुरु शिष्य पालं शेष हिमालम
शशि खंड भालं ॥
कालस्य कालं जित जन्म जालम वंदे जटालं जग्दाब्जा नालं ॥

सुने सुनावे प्रेमवश पूजे अपने हाथ ।
मन इच्छा सब कामना , पुरे गोरक्षनाथ

गुरु ॐ गुरु ॐ गुरु ॐ गुरु ॐ गुरु ॐ गुरु ॐ
अल्लख ॥ ॥ ॥ ॥ ॥


श्री गोरक्ष अष्टोत्तर नामावली

ॐ श्री गोरक्ष नमः
ॐ उं श्री गोरक्षाया नमः
र्हीं श्री गोरक्षाया नमः
श्री श्री गोरक्ष नाथाय नमः
श्री गों श्री गोराक्षनाथाया नमः
श्री लीं श्री गोरक्षनाथय नमः
श्री हं श्री गोरक्ष नाथायनमः
श्री हाँ श्री गोरक्ष नाथाय नमः
श्री निरंजनात्मा नेय नमः
श्री हूँ श्री गोरक्ष नाथाय नमः
श्री सं श्री गोरक्ष नाथाय नमः
श्री हंसा श्री गोरक्ष नाथाय नमः
श्री गुरुपद जप सत्याय नमः
श्री अद्वैताया नमः
श्री प्राण चैतन्याय नमः
श्री नित्य निर्गुनाया नमः
श्री महत्मनेया नमः
श्री निल्ग्रिवाया नमः
श्री सोहमसद्याकाया नमः
श्री ओमकार रुपेय नमः
श्री गुरु भक्तया नमः
श्री श्री गुरु भौमाय नमः
श्री श्री गुरुचरण प्रियाय नमः
श्री गुरु उपसकाया नमः
श्री श्री गुरु भक्तिप्रियाय नमः
श्री योगेश्वराय नमः
ॐ श्री राजयोगाया नमः
ॐ श्री अस्त्र विद्या प्रविनाय नमः
ॐ अस्त्र विद्या प्रविनाय नमः
श्री वायु नंदा नाय नमः
श्री कमंदालू धार्काय नमः
श्री त्रिशूल धार काय नमः

शिर गुरु गोरक्षनाथ जी की संध्या आरती
ॐ गुरूजी शिव जय जय गोरक्ष देवा। श्री अवधू हर हर गोरक्ष देवा॥
सुर मुनि जन ध्यावत सुर नर मुनि जन सेवत ।
सिद्ध करे सब सेवा, श्री अवधू संत करे सब सेवा। शिव जय जय गोरक्ष देवा॥ १॥

ॐ गुरूजी योग युगती कर जानत मानत ब्रह्म ज्ञानी ।
श्री अवधू मानत सर्व ज्ञानी।
सिद्ध शिरोमणि रजत संत शिरोमणि साजत।
गोरक्ष गुन ज्ञानी , श्री अवधू गोरक्ष सर्व ज्ञानी । शिव जय जय गोरक्ष देवा॥ 2॥

ॐ गुरूजी ज्ञान ध्यान के धरी गुरु सब के हो हितकारी।
श्री अवधू सब के हो सुखकारी ।
गो इन्द्रियों के रक्षक सर्व इन्द्रियों के पालक।
रखत सुध साडी, श्री अवधू रखत सुध सारी। शिव जय जय गोरक्ष देवा॥ 3॥

ॐ गुर्जी रमते श्रीराम सकल युग माहि चाय है नाही।
श्री अवधू माया है नाही ।
घाट घाट के गोरक्ष व्यापे सर्व घाट श्री नाथ जी विराजत।
सो लक्ष मन माहि श्री अवधू सो लक्ष दिल माहि॥ शिव जय जय गोरक्ष देवा॥ ४॥

ॐ गुरूजी भस्मी गुरु लसत सर्जनी है अंगे।
श्री अवधू जननी है संगे ।
वेड उचारे सो जानत योग विचारे सो मानत ।
योगी गुरु बहुरंगा श्री अवधू बाले गोरक्ष सर्व संगा। शिव जय जय गोरक्ष देवा॥ ५॥

ॐ गुरूजी कंठ विराजत सेली और शृंगी जत मत सुखी बेली ।
श्री अवधू जत सैट सुख बेली ।
भगवा कंथा सोहत- गेरुवा अंचल सोहत ज्ञान रतन थैली ।
श्री अवधू योग युगती झोली। शिव जय जय गोरक्ष देवा॥ ६॥

ॐ गुरूजी कानो में कुंडल राजत साजत रवि चंद्रमा ।
श्री अवधू सोहत मस्तक चंद्रमा ।
बजट शृंगी नादा- गुरु बाजत अनहद नादा -गुरु भाजत दुःख द्वंदा।
श्री अवधू नाशत सर्व संशय । शिव जय जय गोरक्ष देवा॥ ७॥

ॐ गुरु जी निद्रा मरो गुरु कल संहारो -संकट के हो बेरी।
श्री अवधू दुष्टन के हो बेरी।
करो कृपा संतान पर गुरु दया पालो भक्तन शरणागत तुम्हारी । शिव जय जय
गोरक्ष देवा॥ ८॥

ॐ गुरु जी इतनी श्रीनाथ जी की संध्या आरती।
निष् दिन जो गावे - श्री अवधू सर्व दिन रट गावे ।
वरनी राजा रामचंद्र स्वामी गुरु जपे राजा , रामचंद्र योगी ।
मनवांछित फल पावे श्री अवधू सुख संपत्ति फल पावे। शिव जय जय गोरक्ष देवा॥ ९॥


Navgraha Havan Mantra

Navgraha Havan Mantra

Rudraksha Utpatti (Origin) Mantra

Rudraksha Utpatti (Origin) Mantra


Sat Namo Adesh, Guruji Ko Adesh, Om Guruji,
Mukhe Brahma Madhye Vishnu Ling Naam Maheshwar Sarvadeva Namaskaram Rudrakshaya Namoh Namah.

Use the above SHABAR Mantra for immediate effects. The Mantra can be recited before wearing Rudraksha / Rudraksha Mala and after removing the same.


Sat Namo Adesh, Guruji Ko Adesh, Om Guruji, Mukhe Brahma Madhye Vishnu Ling Naam Maheshwar Sarvadeva Namaskaram Rudrakshaya Namoh Namah. Gaganmandal May Dhundhukara Pataal Niranjan Nirakaar. Nirakaar May Charna Paduka, Charna Paduka May Pindi, Pindi May Vasuk, Vasuk May Kasuk, Kasuk May Kurm, Kurm May Mari, Mari May NaagFani, Alash Purush Nay Bail Kay Seengh Par Rai Thaharahi. Dhiraj Dharm Ki Dhuni Jamai. Vahaan Par Rudraksha Sumer Parvat Par Jamaiye Usme Se Phootay 6 Dali, Ek Gaya Purv, Ek Gaya Dakshin, Ek Gaya Paschim, Ek Gaya Uttar, Ek Gaya Akaash, Ek Gaya Pataal, Usme Lagya Ek Mukhi Rudraksha, Shri Rudra Par Chadaiye. Shri Onkaar Adinath Ji Ko, Do Mukhi Rudraksha Chadaiye Chandra Surya Ko, Teen Mukhi Rudraksha Chadaiye Teen Loko Ko, Chaar Mukhi Rudraksha Chadaiye Chaar Vedon Ko. Paanch Mukhi Rudraksha Chadaiye Paanch Pandavo Ko, Chaah Mukhi Rudraksha Chadaiye Shat Darshan Ko, Saat Mukhi Rudraksha Chadaiye Sapt Samudro Ko, Astha Mukhi Rudraksha Chadaiye Astha Kuli Nago Ko, NavMukhi Rudraksha Chadaiye NavNaatho Ko, Dash Mukhi Rudraksha Chadaiye Dash Avtaaro Ko, Gyaara Mukhi Rudraksha Chadaiye Gyaara Rudra Ko, Dvaadash Mukhi Rudraksha Chadaiye (Surya) Baraah Panth Ko, Terah Mukhi Rudraksha Chadaiye Tentees Koti Devtao Ko, Chaudhah Mukhi Rudraksha Chadaiye Chaudhah Bhuwan (Chaudhah Ratno) Ko, Pandrah Mukhi Rudraksha Chadaiye Pandrah Thithiyo Ko, Solah Mukhi Rudraksha Chadaiye Solah Shringaar Ko, Satraah Mukhi Rudraksha Chadaiye Shri Sita Mata Ko, Attharaha Mukhi Rudraksha Attharaha Bhaar Vanaspati Ko, Unnees Mukhi Rudraksha Chadaiye Alash Purush Ko, Bees Mukhi Rudraksha Chadaiye Vishnu Bhagwan Ko, Ikkis Mukhi Rudraksha Chadaiye Ikkis Brahamaand Shiv Ko,Nir Mukhi Rudraksha Chadaiye Nirakaar Ko, Itna Rudraksha Mantra Sampurna Bhaya, Shri Nath Ji Kay Charan Kamal May Adesh, Adesh

 --------- जय श्री आदि नाथ जी ----------

------------ ज्ञान चालीसा -------------------
सत नमो आदेश . गुरु जी को आदेश . ॐ गुरु जी . ॐकार नाद से उत्पति माया .
आदि नाथ संग पार्वती माता . सुन पार्वती कहें महादेव . भेद नाद बिन्द का
जाने बिरला . 1!! ॐ आदि नाथ मुखै ज्ञान प्रगटाया . पर जोग निंद्रा भई
माता गौरजा . शब्द शब्द पर हुँकाराया . ध्यान ज्ञान से भेद को पाया !!2!!
क्षीरसागर तट पर हुंकार समाया . राघौ मत्स्य गर्भ बालक बैठा . गर्भ ज्ञान
शिव ने कराया ,मत्स्येन्द्र नाम का जोगिन्दर प्रगटा !!3!! सत गुरु ज्ञान
को धारण कीन्हा ,तब पीच्छे गुरु गोरखनाथ को दीन्हा ! देखो सिद्धों यही
ज्ञान अनन्त कोट सिद्धों को गुरु गोरखनाथ पढ़ कथ कर सुनाया !!4!!
आदि नाथ पारब्रह्म शिव शक्ति प्रथम आदि उत्पति माया ! ॐकार रुप नाद बिन्द
कहाया ,बिन्दु रुप बोलिए काया !!5!! उदै भइला सूर अस्त भईला चंदा दूहू
बीच कल्पना काल का फंदा उदै अस्त एक कर बासा तब जानिबा जोगींद्र जीवन आसा
! बारह कला रवि सोलह कला शशि ! चारी कला गुरुदेव निरंतर बसी !!6!! हीन पद
सुराया लागा डँसा ! तन का तेज ले उड़िया हँसा ! हँस का तेज ले थिर रहे
काया ! काल का भेद ले कहो गुरु राया !!7!! द्वै पंख छेदी एक है रहना ,चंद
सूर्य दोउ सम कर गहना ! ऊंच भै ऊपरै मध्य निरंतरे ता तल भाट जराई !!8!!
शीजी अमिरस कंचन हुआ यही विधि पिंजरे बनवै सुआ ! उपजत दीसन्त निपजत नाहीं
! आवरण नास्ति संसार माही !!9!! बूझले सत्गुरु बुद्धि भेद सिद्ध संकेत
,परचा जानी लगाबो हेत ! उरम धूरम ज्योति ज्वाला ,नौ कोटि खिड़की पूर ले
ताला !!10!! ताला ना टूट खिड़की न भांजे ,पिंड पड़े तो सत्गुरु लाजे ! भरे
सागर धुनि धूसर कूची तहां सकल विध है सोई सूची !!11!! यही विधि अतीत योगी
होई ,अमर पद ध्याबत बिरला कोई ! सहज मरे अष्ट पग धरना ,ज्ञान खड्ग ले काल
सण्हर्णा !!12!! अमर कोट काया एक कोट मध्ये ,जीतले यम पुरी राखि ले कंधे
! आत्मा झुझजती गोरखनाथ किया ! संसार विनाशा आपन जिया !!13!! झूझँत सुरा
बूझन्त पूरा अमर पद ध्याबँत गुरु ज्ञान वँका !दल को मारि जंजाल को जीतले
,निर्भय होई मिटिले मन की शंका ! अझूझि झूझि ले पैस दरिया ! मूल बिन वृष
अमिरस भरिया !!14!! तन मन कर ले शिव पूर मेला ,ज्ञान गुरु जोगी संसार
चेला ! मन राई चंचल थान स्थित नाहीं ! बाँधी ले पंचभूत आत्मा माही ! अलष
अकथ चछुबिन सूझिया ! सिद्ध का मार्ग साध के बूझिया !!15!! परख बिन गुरु
करे युगत बिन वहि मरे ,विचार उपरांति कछु ज्ञान नाहीं ! भ्रमि भूलें ते
वहि चले पंडिता ,उतरे पार ते फिरी समाहि !!16!! शब्द की परखा नहीँ सबद
हुआ ,ज्ञान का पारिखा जीबता मुंआ ! रहती करनी मुखे प्रकाश ,नासिका जानत
पहुप की बास !!17!! उलटी यंत्र धरे शिखर -आसन करे कोटि सर छूट घाव नाहीं
! सिलहट मध्ये काबरु जीतले ,निर्मल धूनी गगना माही !!18!! मन की भ्रमना
तब छूटते होई योगिँद्रा ,जब बिचारँत निहशबद की वाणी ! नैन कै दाता सार
धरि पीसीबा तब योग पद दुर्लभ सत्य कर जानी !!19!! उलटी गँगा ऊपर चले धरान
ऊपर ,मिले नीर में पैस्सी करि अग्नि जाले ! घटहि में पै शिखर कूप पानी
भरे ,तब पई परिपुरुशा आप उजाले !ज्ञान के के प्रगटे श्री शम्भुनाथ पाया
,अकल अकथ जती गोरखनाथ ध्याया !!20!! संसार में भ्रमिया सर्व भ्रम सोई
,निज पद पीबता बिनस्या ना कोई !बजरंग कोटरि पर दल पूरा ! पंच मुंआ सब जग
पहुँचा स सुरा !!21!! मन सो झूझना खाँड़ा न लागे शून्य गढ़ रम रहे तो दीप
धूनी जागे ! धरणी ना सोखे अग्नि न खाई ,वैली का रस ले भौंरा न जाई !
!22!! कथनी कथि हो पंडित रहनी न पाई ! आचार के बँधे मनसा गमाई ! कथत श्री
शंभूनाथ सुनो नर लोई भ्रम में भूला सो बहुरा न कोई !!23!! भूल्या सो
भूल्या बहुरि चेतना ,संसार के लोहे आपा न रेतना ! भेष तज भ्रम तज राखी
सत्य सोई ,तत बिचारता देवता होई !!24!! आपा सोँधो ब्रह्म निरोधि सहज पलटी
जोती ! काया के भीतर मणि माणिक निपजे तहां धुनि धुनि बरसें मोती !!25!!
अरध उरध सम्पुश्टि करीजे !शंखनि नाल अमीरस पीजे ! अखंड मण्डल तहां नाद
मेरी ले ,हरि आसन तहां भक्त करीले !!26!! आलेख मन्दिर तहां शिव शक्ति
निबासा ,सहज शून्य भया प्रकासा ! तहां चंद बिन चाँदनी अग्नि बिन उजाला !
ए तन भेद अंत वृद्ध वाला !!27!! करताज तजी हूँ आसक्त hu हूँ न जाई ,मन
मृग राखिले वाड़ी न पाई ! आकाश वाड़ी पाताल कुआँ भरी भरी सीचता जो सिद्ध
huaaहूआ !!28!! अवधू अमर कोटकाया आलेख दरवाजा ! ज्ञानी gadगढ़ आसन प्राण
भयो राजा !!29!! अवधू फेरी ले तो तत सार बुद्धि सांच ! नही toतौ लोहा
गडिले तो कंचन नहीँ toतो काँच !!30!! अवधू सिद्धा पाया साधक पाया ते
ऊतरिया पार कथँत जती गोरखनाथ चेते न जानत विचार ते जल भए अंगार !!31!!
अवधू ऐसा नगर हमारा तिहा जीव आवो ऊजु द्वार !अरध उरध बजार मण्डियां है
गौरष कहें विचार !!32!! हरि प्राण पातिसाह विचार काजी !पंच तत ते उजहदार
,मन पवन होऊं हस्ती घोड़ा ,गिनाँते आंखै भंडार !!33!! काया हमारी शहर
बोलिये मन बोलिये हज दार ! चेतन पहरे कोतवाल बोलिये ,तो चोर न झांकें
द्वार !!34!! तीनसौ साठ चीरा gadगढ़ रचीले सोलह खनिले खाई !नव दरवाजा
प्रगट डीसे दसवां लखा न जाई !!35!! अठारह भार कोट कन्ठजरा लाईले बहत्तर
कोठरी निपाई ! नव सत्र ऊपरे जंतर फिरे ,तब गाया गढ़ लिया नहीँ जाई !!36!!
अनहद घड़ी घड़ियाल बजाइले ,परम ज्योति दुई दीपक लाई ! काम क्रोध दोई गरदन
मारिले ,ऐसी अदली पात शाही बाबे आदम चलाई !!37!! तहां सत्य बीबी संतोष
साहीजादा सीमा भक्ति द्वै दाई ! आदि नाथ नाती मत्स्येन्द्र पूता काया
नगरी गोरख बसाई !!38!! ऐसा उपदेश दिखै श्री गोरख राया , जिनी जगचतुर वरन
राह लाया पढ़ले ससंबेद करिले विधि ज़षेद !जानिले भेदान भेद पूरिले आशा
अमेद ,विषमी साधे मंसारी संझाया पंचों बखत सार ! रहिबा दसवें द्वारी
सैइबा पद निराकार !!39!! जप ले अजपा जाप ! विचार लेआपो आप ,छुटला सब
बियाप ! लिपे नाहीं तहां punyपुन्य पाप ! अहो निष समो ध्यान ! निरंतर रमे
बा राम ,कथे गोरखनाथ जी ज्ञान ; पाईला परम निर्धान !!40!! श्री नाथ जी को
आदेश !!!


-------- जय श्री आदि नाथ जी -----------
रुद्राक्ष का मन्त्र
सत गुरु नमो आदेश ! गुरु जी को आदेश ! ॐ गुरुजी ! मुखे ब्रह्माजी मध्ये
विष्णु लिंग नाम महेश्वरा !सर्व देव नमस्कारम रुद्राक्षाये नमो नम: !
गगनमन्डल धूधूकारा पाताल निरंजन निराकारा ! निराकार में चरण पादुका ,चरण
पादुका में पिंडी पिंडी में बासुक ,बासुक में कासुक ,कासुक में कूर्म
,कूर्म में मरी ,मरी में नागफ़नी ,नागफ़नी पर धौल बैल -धौल बैल के सींग पर
राई ठहराई ! धीरज धर्म की धूनी जमाई ! वहाँ पर रुद्राक्ष सुमेर पर्वत पर
जमाईये उसमे से फूटें छः डाली ! एक गया पूर्व एक गया दक्षिण -एक गया
पश्चिम -एक गया उत्तर -एक गया आकाश -एक गया पाताल -उसमें लाग्या एक मुखी
रुद्राक्ष ,श्री रुद्र पर चडाइए ! श्री ॐकार आदि नाथ जी को !(कंठ ) दो
मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइए चंद्र सूरज को ! (मस्तक ) तीन मुखी रुद्राक्ष चढ़ाईए
तीन लोकों को ! (दाहिनी भुजा ) चतुर्मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइए चार वेदों को !
(मस्तक पर ) पाँच मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइए पाँच पांडवों को ! (बाई भुजा ) छः
मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइए षटदर्शन को ! (गले में ) सात मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइए
(सप्तऋषि ) सप्त समुद्रों koको ! (दाहिनी हथेली ) अष्ट मुखी रुद्राक्ष
चढ़ाइए अष्ट कुली नागों को ! (आसन ऊपर ) नव मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइये नव
नाथों को ! (हृदय स्थान ) दस मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइये दस अवतारों को !
(दाहिनी भुजा ) ग्यारह मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइये ग्यारह रुद्र को ! (जटाओं
में ) द्वादश मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइये ! बारह मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइये बारह
पंथों को ! (हृदय स्थान ) तेरह मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइये तैतीस कोटि देवताओं
को !( दाहिनी हथेली ) चौदह मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइये चौदह भुवन को ! (आसन
ऊपर ) पंद्रह मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइये पंद्रह तिथियों को ! (बाई भुजा )
सोलह मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइये सोलह श्रंगार को ! (आसन के नीचे धर्तरी ऊपर )
सत्रह मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइये श्री सीता माता को ! (आसन के नीचे धरत्री
ऊपर ) अठारह मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइये अठारह भार वनस्पतियों को (अठारह पुराण
)को ! (बाई हथेली में ) उन्नीस मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइये अलष पुरुष को !
(गले में ) बीस मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइये विष्णुजी भगवान को ! (बाई हथेली )
इक्कीस मुखी रुद्राक्ष चढ़ाइये इक्कीस ब्रह्मांड शिव को ! (जटाओं में )
निरमुखि रुद्राक्ष चढ़ाइये निराकार को !
श्री नाथ जी को आदेश आदेश आदेश

------- जय श्री आदि नाथ जी ---------------
नाथ सिद्धों के योग माया कर्म कांड में आसन विधान अनुसार कुशासन लगाने से
ज्ञान की प्राप्ति होती है ! उस के ऊपर बस्त्रासन लगाने से शक्ति की
प्राप्ति होती है ! तथा कम्बलासन लगाने से मनोकामना सिद्धि प्राप्ति होती
है ! अतः कुशासन ,वस्त्र या कम्बलासन अत्यंत शुद्ध पवित्र एवं सात्विक
गुण सम्पन्न होते हैं ! इन आसनों पर जो भी साधना अर्थात तन्त्र मन्त्र
तथा सिद्धियाँ ,पूजा कर्म कांड ,उपासना एवं यौगिक साधना करने पर साधक को
ज्ञान सिद्धियाँ तथा सात्विक गुणों की प्राप्ति होती है ! इन आसनो पर
देवी देवता ,ऋषि मुनि एवं नाथ सिद्धों के साक्षात्कार दर्शन होते हैं
विशिष्ट समय ,विशिष्ट मन्त्र रोज़ लगातार 41 दिन तक करने पर आसन सिद्ध
होता है ! तथा सवा वर्ष साधना करने पर ज्ञान कैवल्यानंद की प्राप्ति होती
है !
इसमें ब्रह्मचर्य का नियम आवश्यक है
नाथ सिद्धों ने और भी आसनों पर हुई साधनाओ का अनुभव प्रचिती निम्न प्रकार
से होती है !
1- कम्बलासन पर साधना -- सर्व कामना सिद्ध होती है !
2 - मृगासन पर साधना -- सम्मोहन आकर्षण प्राप्ति होती है !
3-- काले हिरण खाल पर साधना -- मुक्ति मोक्ष की प्राप्ति !
4-- बाघाम्बर आसन पर साधना -- मोक्ष प्राप्ति होती है ( तामसी साधना
,--तामस गुण ,कापालिक गुण प्राप्ति होते हैं )
5-- कुशासन पर साधना -- ज्ञान की प्राप्ति
6-- पत्तों के आसन पर साधना -- पत्तों के आसन पर साधना करने से दीर्घायु
प्राप्ति होती है !
7-- भबूति का आसन -- श्मशान वैराग्य ,त्याग की प्राप्ति होती है !
8-- श्वेताम्बर आसन पर - ज्ञान ,विद्या ,कला ,वैभव ,समृद्धि की प्राप्ति होती है !
9-- पीताम्बर आसन -- पीले वस्त्र परिधान कर या रेशमी वस्त्र पहनकर या
रेशमी बस्त्रासन पर साधना करने पर पुष्टि कार्य ,समृद्धि कार्य प्राप्ति
होती है !
10-- भगबासन आसन -- सच्चे सत्गुरु की प्राप्ति होती है
11-- गौ मूत्र या गोबर लेपन भूमि पर कम्बल या बस्त्रासन पर साधना करने पर
मुख्यतः गौ लोक गमन होता है ! ब्रह्मा विष्णुजी महेश तथा देवी देवता
प्रसन्न होकर दर्शन देते हैं ! मृत्युंजय मन्त्र साधना करने पर आधी
व्याधि ,ज़रा मरण से मुक्त होकर स्वर्ग सुख प्राप्ति होती है !
12-- हस्तीचर्म आसन -- साम ,दाम दण्ड की प्राप्ति होती है !
13- सिंहासन आसन -- राज़ योग की प्राप्ति होती है !
14-- चीताम्बर आसन अथवा शबासन या प्रेतासन या मुरदे के ऊपर बैठ कर साधना
करने पर श्मशान सिद्धियाँ ,तामसी ,कापालिक ,भैरवी ,बेतालादी सिद्धियाँ
प्राप्त होती हैं ! मारन उच्चाटन ,भूत प्रेत वशीकरण आदि मृतात्मा आत्मा
द्वारा कार्य सिद्धियाँ आदि अभीष्ट सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं !
यह गुरु मार्ग दर्शन पर करना उचित है !!!
कुछ निषिद्ध आसन साधनाये
1-- पत्थरासन पर साधना - दुःख क्लेश की प्राप्ति !
2-- लकड़ी पर आसन साधना -- आदि व्याधि रोग की प्राप्ति !
3-- शुद्ध बस्त्रासन -- स्त्री की प्राप्ति
4-- बिना आसन --- केवल भूमि पर बैठ कर मन्त्र सिद्ध नहीँ होते !
5- तृणासन पर साधना -- इससे कीर्ति की हानि होती है !
6-- बँशासन पर साधना -- दरिद्रता होती है

------------ श्री नाथ पँचमात्रा -जाप -----------
सत नमो आदेश .गुरु जी को आदेश .ॐ गुरुजी .जाप जपें जाप अलख जगाबे .योगी
अवधूत सेली सिँगी मेखला पाताल लोक की योग ,युगत निरझम कलम स्वासा ,मुद्रा
चक्र काया ,खप्पर त्रिशूल झोली झंडा हाल मतँगा हाथ का कंगन पाव का लंगर
भुज का बाजूबंद धुरी कटारी भगवा कँथा भाखडा माथे लाल सिंदूर का तिलक शैली
सिँगी ,रक्त गाति ,भगवा साफ़ा ,भभूति सिर जटा सिर की टोपी ,सिर का बाल
चक्कर ,त्रिशूल फावड़ी चिमटन ,गोरख धँधा ,तुम्बी चल छडी तू क्या पूछे अलष
रुप पुरुष की वात ,मैं योगी अवधूत तीन युगों से न्यारा खेलूं मैं योगी
अवधूत आवो सिद्धों बैठो सिद्धों बैठे जंगल की हिरणी .हम क्यों बैठे योगी
अवधूत ,तीन युगों से न्यारा खेलूं योगी अवधूत श्री गोरख अवधूत .
श्री नाथ जी को आदेश आदेश आदेश

----------गुरु गोरखनाथ कुण्डली ------------
सत नमो आदेश . गुरुजी को आदेश . ॐ गुरुजी . प्रथमे बोलिये श्री शम्भू जती
गुरु गोरखनाथ जी देव . विष्णु देव , महेश्वर देव , ब्रह्मा देव , शक्ति
देव , आकाशे, पाताले ,शेष अनन्त कोटि सिद्धों पर करलो आदेश . आरती दर्शन
नाम तुम्हारे - आप तरे जगत को तारे , ज्ञान खड्ग ले काल सँहारे . जब हाँक
पे डंका बजाबे ,खेचरी भूचरि देव और दानव मारे . कार के मारे गोरख जपे
अनघड़ काया ,सोलह कला सम्पूर्ण माला घट पिंड की रक्षा करे श्री शम्भू जती
गुरु गोरखनाथ जी वाला . अमरी धो धो पीबो खीर अमर हो देही वज्र हो शरीर .
ॐ गुरुजी मीन राय को करलो आदेश .गौरी शंकर को करलो आदेश .पश्चिम देश आई
उमा देवी आगे बेठी मीन मत्स्येन्द्र गोरख योगी .जब देवी ने किया आदेश
,नही लिया आदेश नही दिया उपदेश .जब देवी क्रोध में आई खंजन बाँध हृदय को
गई .नाथ निरंजन सही कर लई .नव वे द्वारे ताडी लाई - दसवें द्वार ब्रह्म
अग्नि पर जाली .जलने लगी तब खड़ी पछताई .राख राख हो श्री शम्भू जती गुरु
गोरखनाथ जी राख तुम्हारी हुन्गी चेली जगत हुन्गी माई .माई कहे ता भोचर सा
तन का कपट हार शृंगार गहू शिव शंकर स्वामी jiजी तुम्हारा कौनसा विचार है
.हम कुछ नही जाने देवी जी .अपना घड़ा आप ही जानो --ईश्वर गोरा दोनो मिला
करे .हाटी ईश्वर जी गए सातवें पाताल वाले गोरख का अनन्त अपार काया ना
माया न छाया कली विच कहा है .हे देवी जी हम को गुरु मुख दिया तुमको
ब्रह्मा मुख दिया ,अनन्त कोट सिद्धों में दंड कमंडल मीन आप ही छू
गुरुमुखी चीन्ह .घटोघटो गोरख काँचे कुबे भर न पानी .घटों गोरख जागँता पाप
के पहरे सोबँता ,धर्म के पहरे जागँता ,घटोघटो गोरख भये उदास पंडित के हम
गुरु ,मूरख के हम दास .घटोघटो गोरख योग पुकारे ,अमर धन कोई बिरला ही जाने
.इन्द्र देव अलील गुफा आये ,सूर्या सरीखा तपी नही ,चंद्रमा सरीखा शीतल
नही .इन्द्र राजा बरसँते ,धरती माता सुफल फलँते ,शिव दर्शनी योगी नित्य
उठ ध्यान धरँते .. श्री नाथ जी गुरु जी को आदेश

- धूनी पर धूप चेताने का मन्त्र ---------
सत नमो आदेश ! गुरु जी को आदेश . ॐ गुरु जी . पानी का बूँद पवन का थम्भ
जहाँ उपजा कल्प वृक्ष का कंध . कल्प वृक्ष ,वृक्ष की छाया जिसमें गुग्गुल
धूप उपाया . जहाँ हुआ धूप का प्रकाश जब तिल घृतं ले किया बास . धूनी
धूपिया अग्नि चढ़ाया . सिद्ध का मार्ग विरले पाया . उर्ध्वमुखी चढ़े
अग्नीमुख जले होम धूप दीप वासना होयले . इक्कीस ब्रह्मांड तैतीस करोड़
देवी देवता को होम धूप दीप बास . सप्तमे पाताल नव कुली नाग बासुक कू होम
धूप बास . श्री नाथ जी के चरण कमल पादुका को होम धूप बास . अलील अनाद
धर्म राजा धर्म गुरु को होम धूप बास . धरती आकाश पवन पानी को होम धूप बास
. चंद्र सूरज को होम धूप बास . तारा गृह नक्षत्र को होम धूप बास . नव नाथ
चौरासी सिद्ध को होम धूप बास . थान मकान मठ मुकाम को होम धूप बास . अग्नि
मुख धूप पवन मुख बास . वासना बासलो थापना थापलौ . जहाँ धूप तहां देव जहाँ
देव तहां पूजा . अलखनिरँजन और नही दूजा . श्री नाथ जी गुरु जी को आदेश
आदेश आदेश .
। । जय श्री आदि नाथ जी । । । । । । । । ।
। । । । । । । । । ओह्म सोहं । । । । । । । । । ।
ॐकार ब्रह्म रुप है तन्त्र में इस के बिन्दु का अर्थ शिव है और बीज का
अर्थ शक्ति है । पृथ्वी बीज का अर्थ शक्ति है । जिस शक्ति में पाँचों
तत्त्व अपने बीजों सहित विद्यमान हैं । जिस में , लँ , बीज पृथ्वी का ,
बँ , बीज जल का , रँ बीज अग्नि का , यँ बीज वायु का , और हं बीज आकाश का
और यह पाँचों बीज , ॐकार , से अभेद हैं । और घट पिंड और ब्रह्मांड पाँच
तत्त्व से ही अभेद है । अत: ॐ से चिदरुपा शक्ति अभेद है । इनका शक्ति का
सम्बन्ध परम्परा शक्ति से रहता है ।
यहाँ पीर आचार्य या उत्तराधिकारी का सम्बन्ध प्रणव के बाक्यार्थ से है ,
वही नाथ तत्त्व का सम्बन्ध प्रणव के लक्यार्थ से है , लख्यार्थ का
सम्बन्ध महाबिन्दु से है , महाबिन्दु का सम्बन्ध परानाद से है , परानाद
का सम्बन्ध ॐकार से है , ॐकार का सम्बन्ध ओह्म सोहं अजपा जाप से है ।
हमारे नाथ सिद्धों में ॐकार का प्रादुर्भाव " सो उ हं " से होता है और
"सों उ हं " श्वास से बनता है । श्वास नाभि चक्र से बनता है और स्थूल
प्राण क्रियाशील रहता है । जिस प्रकार भूख लगती है सूक्ष्म इच्छा
प्रत्यक्ष भोजन करना स्थूल रुप है । प्राणी 21600 श्वास के ओम सोहं करता
है । इसे हं सं बोलते हैं । हं हं करते श्वास आवाज़ करते बाहर निकलता है
और सं सं करते श्वास भीतर आता है । इस हं सं के प्राणों को शरीर के अन्दर
रोकने में अन्दर ॐ का प्राकत्य होता है । और ध्यान में एकाग्रता आती है ।
यह नाथ सिधान्त है । इसे महा विद्या कहते हैं ।
इस प्रकार ॐ गुरु जी ॐ सोहं तक रहस्य हुआ । आदेश आदेश आदेश
। । ॐकार स्वरूपी योग माया पूजन । । । ।
ॐकार प्रणव से सात्विक , राजस , तामस गुण दर्शाते हैं ।
अर्थात - - - अ , उ , म - अर्थात ब्रह्माजी , विष्णुजी , महेश तीनो देव ।
ब्राह्मी , लक्ष्मी , गौरी तीनो शक्तियां । सृष्टि , स्थिति , प्रलय तीनो
स्थिति । भूत , भविष्य , वर्तमान तीनो काल । प्रथम , उत्तम , मध्यम । तीन
वेद ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद । तीन लोक स्वर्ग , पाताल , मृत्यु । तीन
आनँद - आनँद , मुक्ति , मोक्ष । इत्यादि त्रिपुटी के योग से योग से ॐकार
बनता है । किन्तु यह सभी ॐकार त्रिपुटी अर्धमात्रा जो शक्ति रुप में ॐकार
के ऊपर [ ँ ] है उस अर्ध मात्रा शक्ति के बिना तथा उसके बिन्दी या बिन्द
जो नाथ सिद्धों का योग बीज है इन के बिना ना ही ॐकार में पूर्णता है और
ना ही उन त्रिगुन त्रिपुटीयों की पूर्णता है । अर्थात ॐकार के तीनो प्रणव
अ , ऊ म ब्रह्मा , विष्णु , महेश या अन्य त्रिपुटी बिन्द रूपी योग या
साधना किये बिना अर्ध मात्रा शक्ति को प्राप्त करके योग साधना पूर्ण कर
उसे त्यागे बिना पूर्ण नहीँ हों सकते । अर्थात योग द्वारा योग शक्ति को
प्रसन्न कर माया से विरक्त होकर मुक्ति को पाना यहीं ॐकार स्वरुपी योग
माया पूजन है ।

। । । । गुरु गोरखनाथ जी का ब्रह्म गायत्री । ।
सत नमो आदेश । गुरु जी को आदेश । ॐ गुरु जी । एक ॐ कार तेरा आधार तीन लोक
में जय जय कार । श्री शम्भू जती गुरु गोरखनाथ जी करें विचार ।
ॐ गुरु जी पार ब्रह्म पार ब्रह्म ज्योति स्वरूप परम अद्वयन योगाचार्य
भगवान श्री शम्भू जती गुरु गोरखनाथ जी के चरणों में ध्यान धराके जूँ
सच्चिदानंद परमात्मा अपने माया गुणों का आश्रय लिया अनन्त रूपों का किया
पसारा । भगवान रजोगुण भये प्रधान , ब्रह्माजी कहालो , सृष्टि रचना भई
प्रमान । भगवान सत्वगुण भए प्रधान विष्णु नारायण कहालो , जगत का सारे भये
पालन हार । भगवान तमोगुण भये प्रधान , रुद्र नाथ जी कहालो , जगत का सारे
करते है संहार । भगवान भगवती का भया अवतार रुप धारण किया महान , दुर्गा ,
अम्बिका , चंडिका , कात्यायनी , गौरी , काली , हिन्गेश्वरि , शिवा भवानी
, रुद्राणी ,घृजाणी , महाकाली , महालक्ष्मी , महासर्श्वती , त्रिपुर
सुंदरी , तारा नाम शक्ति पुकारा । जहाँ भगवान वृष्टि बरसाये तहां इन्द्र
देव कहालो । जहाँ भगवान लोकों को धार्या तहां शेष नाग अनन्त कहालो । जहाँ
भगवान जगत के काल चक्र का करें प्रकाशा , तहां सूर्य नारायण कहालो । जहाँ
भगवान धर्म अधर्म का किया न्याय तहां कहालो देव धर्म राज़ । प्राणियों को
दण्ड देने से भगवान को कहालो यमराज़ ।
ॐ चार खानी , चार वाणी , चंदा सूरज पवन पानी नौ नाथ , चौरासी सिद्ध , भेष
12 पंथ , बारह राशि , सात बार , 27 नक्षत्र , नौ ग्रह , नौ खंड , नौ करण
, नौ व्याकरण , चार वेद , चार उप वेद , 18 पुराण , 18 उप पुराण , खट
दर्शन , 28 योग 10 मन , पाँच ज्ञान इंद्रिय , पाँच कर्म इंद्रिय , पाँच
प्राण , मन बुद्धि , चित्त , अहंकार , शब्द , स्पर्श , रुप , रस , गंध
पंचम मात्रा जागृति , स्वपन , सुसुप्ति , तुर्या , तुर्यातीत , विश्व ,
तेजश्व , प्राम्य , अन्नमय , प्राणमय , मनोमय , विज्ञानमय , आनँद मय ,
पंच कोश , षोडशकला , षोडशतिथि , अष्टबसुओं को लेकर भगवान विराट
हिरण्यगर्भ धारण करालो ।
वही विश्वनाथ , वही तुंगनाथ , वही केदारनाथ कहालो । वही बदरीनाथ , वही
त्रिलोकिनाथ वही मुक्ती नाथ कहालो । वही अमर नाथ वही भेरो नाथ वही
गोरखनाथ कहालो । वही जालंधर नाथ वही मत्स्येन्द्रनाथ वही आदि नाथ कहालो ,
वही सत नाथ वही सन्तोष नाथ वही उदय नाथ कहालो कहालो । वही गज बेली गज
कन्थण नाथ , वही चोरन्गी नाथ वही चौरासी सिद्ध , अनन्त कोट कहालो । वही
राम , वही कृष्ण वही गोविन्द वही माधव कहालो । वही शिव वही शक्ति वही
अर्धनारीश्वर कहालो । वही नारी वही नर वही नारायण कहालो । वही प्रकृति
वही पुरुष वही जीव कहालो । वही ज्ञान बाण , वही वेग बान वही शक्तिमान
कहालो । वही देवी वही देवता वही अनंता कहालो । वही साकार वही निराकार वही
अनन्ताकार कहालो । श्री नाथ जी गुरु जी को आदेश

---------------------------------------आज गुरु गोरखनाथ जी की ज्ञान गोदड़ी ।
ॐ गुरु जी सत नमो आदेश । गुरु जी को आदेश । नव नाथ चौरासी सिद्धों को आदेश ।
नाथ कहें दोनो कर जोड़ी , यह संशय मेटों प्रभू मोरी ।
काया गोदडी का बिस्तारा तासे हों जीवन निस्तारा ।
आदि पुरुष इच्छा उपजाई , इच्छा सखत निरंजन मांहि ।
इच्छा ब्रह्मा , विष्णु , महेशा , इच्छा शारद गौरी गनेशा ।
इच्छा से उपजा संसारा , पाँच तत्त्व गुण तीन पसारा ।
अलष पुरुष जब किया बिचारा , लक्ष चौरासी धागा डाला ।
पाँच तत्त्व की गुदड़ी बीनी , तीन गुणों से थाडी कीनी ।
तामे जीव , ब्रह्म है माया , सत गुरु ऐसा खेल बनाया ।
सीवन पाँच पच्चिसो लागे , काम , क्रोध , मद , मोह त्यागे ।
अब काया गोदड़ी का बिसतारा , देखो सन्तों अगम्य अपारा ।
चंद्र , सूर्य दो चंदोआ लागे , गुरु प्रताप से सोबत जागे ।
शब्द शुई सुरिति का डोरा , ज्ञान का टोपा निरंजन ओढ़ा ।
इस गोदड़ी की करि होशियारी दाग ना लागे देख बिचारी ।
सुमति के साबुन सत गुरु धोई , कुमति के मैल को दारे खोई ।
जिन गोदड़ी का किया बिचारा , उन को भेंट सिरजन हारा ।
धीरज धूनी ध्यान धर आसन , जतकि कोफिन सत्य सिंहासन ।
उक्ति कमंडल कर गहे लीना , प्रेम फावड़े सत गुरु चीना ।
सेली शील विवेक की माला , दया की टोपी तन धर्म साला ।
मेहर मतंगा मत वैशाखी , मृगछाला मन ही की राखी ।
निष्ठा धोती पवन जनेऊ , अजपा जपें सो जाने भेउ ।
रहे निरंतर सत गुरु दाया साधो की संगत से कुछ पाया ।
लय की लकुति हृदय की झोली क्षमा खड़ाऊ पहिरि बहोरी ।
मुक्ति मेखला सुकृत सुमरनि , प्रेम प्याला पीले मौनी ।
दास कूबरी कलह निबारी , ममता कुत्ती को ललकारी ।
यतन जंजीर बाँध जो राखे अगम्य अगोचर खिड़की लाखे ! ।
बीतराग वैराग्य निधाना तत्त्व तिलक दिनो निरबाना ।
गूर ग़म चकमक मन सम तुला ब्रह्म अग्नि प्रगट भई मूला ।
संशय शोक सकल भ्रम जारे , पाँच पच्चिसो प्रगटे मारे ।
दिल के दर्पण दुविधा धोई सो योगेश्वर पक्का होई ।
सुन्न महल की फेरी देई अमृत रस की भिक्षा लेई ।
सुख दुःख मेला जग का भावे त्रिवेणी के घात नहाबे ।
तन मन खोज भया जब ज्ञाना तब लख पद पावे निर्बाना ।
अष्ट कमल दल चक्र सूझे योगी आप आप में बूझे ।
ईडा पिंगला के घर जाई सुशम्न नीर रहा ठठराई ।
ॐ सोहं तत्त्व बिचारा बाँक नाल में किया सम्भारा ।
मनसा मार्ग गगन चढ़ जाई , मानसरोवर बैठ नहाई ।
छुट गई कलमश मिले अलेखा इन नैनो से अलख को देखा ।
अहंकार अभिमान बिदारा घट में चौका किया उजियारा ।
श्रिद्धा चँवर प्रीति की धुपा निष्ठा नाम गुरु का रूपा ।
अनहद नाद नाम की पूजा ब्रह्म वैराग्य देव नहीँ दूजा । चित का चंदन तुलसी
फूला हित का सम्पुट करले मुला ।
गुदड़ी पहनी आप अलेखा जिसने चलाया प्रगट भेषा ।

स्थान वर्णन । । । । । । ।
पहले मूलाधार वा स्वाधीष्टान इन दो चक्रों के बीच में योनी स्थान है ।
यहीं काम रुप पीठ अर्थात मूलाधार कणिका में काम रुप पीठ है ।
मूलाधार (गुदा )में जो चतुर्दल कमल विख्यात है इस के मध्य में
त्रिकोणाकार योनी है । जिसकी वंदना समस्त जन करते हैं । यह पन्चाशत वर्ण
से बनी हुई कामाख्या पीठ कहलाती है ।
त्रिकोनाकार योनी में सुशुमना द्वार के सम्मुख स्वमभू नाम का जो महालिंग
है उस के सिर में मणि के समान देदिप्यमान बिम्ब है यहीं कुण्डलिनी ,
जीबाधार , शरीराधार , , मोक्षद्वार है । इसे जो सम्यक प्रकार से जानता है
उसे योगविद कहते हैं ।
मेढ़ू से नीचे मूलाधार कणिका में तपे हुये स्वर्ण के समान एवं विद्युत के
समान चमक दमक वाला जो त्रिकोण है वहीँ कालाग्नि का स्थान है ।
इसी त्रिकोण विषय समाधि में अनन्त विश्व में व्याप्त होने वाली परम
ज्योति प्रकट होती है । वहीँ कालाग्नि का रुप है । जब योगी ध्यान , धारणा
, समाधि द्वारा उक्त ज्योति देखने लगता है तो उसका जन्म मरण नहीँ होता
अर्थात वह अमर हों जाता है ।
स्वशब्द प्राण (हंस ) का बोधक है इसका आश्रय लिंगमूल में है । प्राण का
अधिष्ठान होने में इसे ही मेढ़ू कहते हैं ।
नाभि में एक कन्द है , जिससे सर्वांग ब्यापनी शिराये निकली हैं । जेसे दस
नसें ऊपर को जो शब्द , रस , गंध , श्वास , जुमाई , क्षुधा , तृषा , डकार
, नेत्रदृष्टि , धारणा इस दस कर्मों को अपने अपने स्थानों पर दीपन करती
हैं । तथा दस नसें नीचे को हैं जो बात , मूत्र , मल , शुक्र , अन्न , पान
, रस को नीचे पहुँचाना इन का काम है । और चार जिनकी टेढ़ी गति है दो
दाहिनी और दो बाई और होकर अगणित सूक्ष्म साखा बनकर सर्वांग में जाले की
तरह रोम रोम प्रति पूरित है । इन्ही के मुखों से प्रस्वेद देह के बाहर
रोमो में होकर आता है तथा उन्ही के मार्गों से लेप मर्दानादि पदार्थ भीतर
प्रवेश करते हैं । इस प्रकार का नाभि कन्द जेसे सूत्र में मणि पिरोया
रहता है ऐसे ही सुशुम्ना नाड़ी में पिरोया है । इसे नाभि मंडल स्थिति
मणिपुर चक्र कहते हैं ।
हृदय में द्वादस दल अनाहत चक्र है जिसमें तत्वातीत जीव है । गुणातीत होने
से पाप पुण्य से भी परे है । परंतु जब तत्त्व की पहचान योग्याभ्यास से
हों जाये तो यह गुण जीव में आते हैं । बिना तत्त्व ज्ञान के जीव भ्रम में
घूमता रहता है

जय श्री आदि नाथ जी ।
नव नाथ बोध । । । । । ।
प्रश्न - - - - नव नाथ सिद्धों के स्वाद ?
उत्तर - - - - ॐ आदि नाथ सर्व उत्तम स्वाद । उदय नाथ मधुर स्वाद । सत्य
नाथ खारा स्वाद । सन्तोष नाथ तीखा स्वाद । अचल अचम्भे नाथ जी खट्टा स्वाद
। गज बेली गजकन्थण नाथ मिल - बला स्वाद । सिद्ध चोरन्गी नाथ रसीला स्वाद
। दादा मत्स्येन्द्रनाथ अनन्त स्वाद । श्री शम्भू जती गुरु गोरखनाथ अमृत
स्वाद ।
प्रश्न - - नव नाथ सिद्धों का स्वभाव ?
उत्तर - - - ॐ कार आदि नाथ भोला स्वभाव । उदय नाथ बैठा स्वभाव । सत्य नाथ
जी शीतल स्वभाव । सन्तोष नाथ संतोषी स्वभाव । अचल अचम्भे नाथ चंचल स्वभाव
। गज बेली गज कन्थद नाथ उभा स्वभाव । सिद्ध चोरन्गी नाथ शीतल स्वभाव ।
मत्स्येन्द्रनाथ थगनी स्वभाव । श्री शम्भू जती गुरु गोरखनाथ उर्द्व
स्वभाव ।
प्रश्न - - - नव नाथ सिद्धों के कौन गुरु कौन देवता ?
उत्तर - - ॐ कार आदि नाथ ॐ कार गुरु परमात्मा देवता । उदय नाथ मन गुरु
वाचा देवता । सत्य नाथ चन्द्र गुरु बुद्धि देवता । सन्तोष नाथ सूर्य गुरु
अनादि देवता । अचल अचम्भे नाथ अवकाश गुरु ॐ कार देवता । गजबेली गज कन्थद
नाथ गोरख गुरु अबिगत देवता । सिद्ध चोरन्गी गोरख गुरु अबिगत देवता ।
मत्स्येन्द्रनाथ शिव गुरु शक्ति देवता । श्री शम्भू जती गुरु गोरखनाथ
मत्स्येन्द्र गुरु परमात्मा देवता ।
प्रश्न - - - नव नाथ सिद्धों की भरिज्या ?
उत्तर - - - ॐ कार आदि नाथ जी भरिज्या शून्य निरंकार । उदय नाथ की
भरिज्या आसा धनबन्ती । सत्य नाथ जी भरिज्या मनसा चोरती । सन्तोष नाथ जी
भरिज्या कल्पना चांडाली । अचल अचम्भे नाथ जी भरिज्या चिंता डाकिनि ।
गजबेली गजकन्थर नाथ जी भरिज्या शंका शिलबन्ती । सिद्ध चोरन्गी नाथ जी
भरिज्या सोलह कला शृंगारी । मत्स्येन्द्रनाथ जी भरिज्या माया ठगनी । श्री
शम्भू जती गुरु गोरखनाथ जी भरिज्या जोग कुण्डलिनी ।

गुरु गोरखनाथ , गणेशजी ज्ञान गोष्टी । । ।
श्री गुरु जी
प्रश्न - - स्वामी जी कहाँ से आये ? आप का नाम क्या है ?
उत्तर - - अवधू - निरंतर से आये , और योगी हम्हारा नाम ।
प्रश्न - - स्वामी जी केसे कर जानिये ? केसे कर मानिये ?
उत्तर - - अवधू - रहत कर जानिये , शब्द कर प्रमाणिये ।
प्रश्न - - - रहत किस को बोलिये ?
उत्तर - - - रहत बोलिये त्रि गुण रहित शब्द बोलिये सब से विवर्जित ।
प्रश्न - - विवर्जित ?
उत्तर - - सूक्ष्म , त्रि गुण बोलिये सत , रज , तम
सत गुणी बोलिये विष्णु , रज गुणी ब्रह्मा जी , तमो गुणी महादेव ।
प्रश्न - - सत , रज , तम किसे कहिये ? और सूक्ष्म किसे कहते हैं ?
उत्तर - - सूक्ष्म कहिये दृष्टि ना देखे , मुषट ना आवै । सत गुण बोलिये
पवन , रजो गुण बोलिये पानी , त्रिगुन तामस रूपी ।
पाँच तत्त्व पच्चीस प्रकृति एता नाम शरीर का ।
पाँच तत्त्व - पृथ्वी , जल , अग्नि , वायु और आकाश ।
पाँच तत्त्वों की पच्चीस प्रकृति ।
1.पृथ्वी - - अस्थि , माँस , त्वचा , नाड़ी और रोम
2. जल - - - लार , मूत्र , पसीना , वीर्य और लहू ।
3. अग्नि - - क्षुधा , तृष्णा , निन्द्रा , आलस , क्रोध 4. वायु - - -
धाबन , आन्कुनचन , चलन , बलन , प्रशारन ।
5. आकाश - -माया , मोह , लज्जा , राग और द्वेष पाँचों तत्त्वों के रंग ?
1. पृथ्वी का पीला
2. जल का श्वेत
3.अग्नि का लाल
4. वायु का धूम्र
5. आकाश का नीला (श्याम )
पाँचों तत्त्वों के स्वभाव
पृथ्वी का बैठा स्वभाव
जल का शीतल स्वभाव
अग्नि का दाह स्वभाव
वायु का चंचल स्वभाव
आकाश का गुम स्वभाव
पाँचों तत्त्वों के स्वाद
पृथ्वी का मीठा स्वाद
जल का खारा स्वाद
अग्नि का तीखा स्वाद
वायु का खट्टा स्वाद
आकाश का फीका स्वाद
प्रश्न - - - - - - - - पाँचों तत्त्वों की भार्या - - ?
पृथ्वी की आशा धनबन्ति
जल की मनसा चोरटी
वायु की चिंता डाकिनि
अग्नि की कल्पना चांडाली
आकाश की संख्या शीलवन्ती
प्रश्न - - पाँचों तत्त्वों के गुरु ?
पृथ्वी के गुरु मन देवता वाचा स्वरूपी
जल के गुरु चन्द्र देवता बुद्धि स्वरूपी
अग्नि के गुरु सूर्य तेज स्वरूपी
वायु का गुरु विष्णु देवता आनाद स्वरूपी
आकाश का गुरु श्री गोरखनाथ अबिगति स्वरूपी
प्रश्न - - पाँचों तत्त्वों के गुण - - ?
उत्तर - - पृथ्वी का मूल गुण
जल का वृद्धि गुण
तेज का रुप गुण
वायु का प्रमल गुण
आकाश का मैथुन गुण
प्रश्न - - पाँचों तत्त्वों के द्वार , आहार , व्यवहार , और निहार ? कोन
कोन से हैं ?
उत्तर - -पृथ्वी का उदर घर , गुदा द्वार , खाई सो आहार , अजरी बजरी निहार
, लोभ लालच व्यवहार ।
जल का ललाट घर इंद्रिय द्वार , स्त्रीया आहार , बिन्दु निहार , मैथुन व्यवहार ।
अग्नि का पित्ता घर , चक्षु द्वार , दृष्टि देखे सो आहार , अदृष्ट निहार व्यवहार ।
वायु का नाभि घर , नाशिका द्वार , वासना आहार , निर्बासना निहार , मिथ्या
व्यवहार ।
आकाश का ब्रह्मांड घर श्रवण द्वार , नाद आहार , जिह्वा शब्द निहार दम्भ
पाखंड , व्यवहार ।
प्रश्न - - पाँच तत्त्व कहाँ से उत्पन्न हुए और कहाँ जा समाये ?
उत्तर - -अवधू परम तत्त्व से उत्पन भये अबिगति जा समाये ।अवगत से उत्पन ॐ
कार , ॐ से उत्पन महा तत्त्व । महा तत्त्व से आकास तत्त्व । आकाश तत्त्व
से वायु तत्त्व । वायु तत्त्व से तेज तत्त्व । तेज तत्त्व से जल तत्त्व ।
जल तत्त्व से पृथ्वी तत्त्व ।
पृथ्वी तत्त्व को ग्रासन्ते जल तत्त्व , जल तत्त्वको ग्रासन्ते अग्नि
तत्त्व , अग्नि तत्त्व को ग्रासन्ते वायु तत्त्व । वायु तत्त्व को
ग्रासन्ते आकाश तत्त्व , आकाश तत्त्व को ग्रासन्ते महा तत्त्व , महा
तत्त्व को ग्रासन्ते ॐ कार , ॐ कार को ग्रासन्ते अबिगत देवता ।
ना आवते ना जाबते निरंजन देवता पाणी का जामन जिंदा अग्नि kका पुट पवन का
खम्भा सुरत निरंत का सोध्या शून्य में समाया अबगति स्वरूपी ।

---------------------------------------------------ओह्म शोह्म रहश्य । । ।
ॐ कार ब्रह्म रुप है तन्त्र में इस के बिन्दु का अर्थ शिव है और बीज का
अर्थ शक्ति है पृथ्वी बीज का अर्थ शक्ति है । जिस पृथ्वी में पाँचों
तत्त्व अपने बीजों सहित विद्यमान हैं जिस में लँ बीज पृथ्वी का , वँ बीज
जल का , रँ बीज अग्नि का , यँ बीज वायु का , हं आकाश का बीज , और यह
पाँचों बीज ॐ कार से अभेद हैं । और घट पिंड और ब्रह्मांड पाँच तत्त्व से
अभेद है । अत: ॐ से चिदरुपा शक्ति अभेद है ।
इस चिदरुपा शक्ति का योग माया पूजन में शक्ति का सम्बन्ध परम्परा शक्ति
से रहता है । यहाँ पीर आचार्य या उत्तराधिकारी का सम्बन्ध प्रणव के
बाक्यार्थ से है । और नाथ तत्त्व का सम्बन्ध प्रणव के लक्ष्यारथ से है और
लक्यार्थ का सम्बन्ध महा बिन्दु से है और महा बिन्दु का सम्बन्ध परानाद
से है , परानाद का सम्बन्ध ॐ कार से है , ॐ कार का सम्बन्ध ओह्म सोहं
अजपा मन्त्र से है ।
हम्हारे नाथ सिद्धों में ॐ कार का प्रादुर्भाव " सों s हं "से होता है और
ॐ s हं "श्वास से बनता है । श्वास नाभि चक्र से बनता है और स्थूल प्राण
क्रिया शील रहता है
जिस प्रकार भूख लगती है सूक्ष्म इच्छा और
प्रत्यक्ष भोजन करना स्थूल रुप ।
प्राणी रात दिन में 21600 श्वास के ओँ सोहं करता है । इसे हंस बोलते हैं
हं हं आवाज़ से श्वास बाहर और सं सं आवाज़ से प्राण अन्दर जाता है । इस
हं सं के प्राणों को अन्दर रोकने से अन्दर ॐ का प्राकत्य होता है और
ध्यान में एकाग्रता आती है । यह नाथ सिधान्त है जिसे प्राण विद्या या महा
विद्या कहते । इसके द्वारा कुण्डलिनी मूलाधार से जागृत होकर स्वाधिश्थान
, मणिपुर , अनहद , विशुद्ध , आज्ञा , सहस्रागार तक प्राण विद्या क्रिया
शील होकर महाविद्या हों जाती है ।
ॐ कार रहस्य । । । । । । । ।
ॐ कार बीज महा बीज है । उस में अकार ब्रह्म वाचक राज़ गुणी है उ कार
विष्णु वाचक सत्य गुणी प्रणव है । , म , कार रुद्र वाचक तामस गुणी प्रणव
है । इन कि अर्ध मात्रा शक्ति की योग माया की है । और अर्ध मात्रा का
बिन्दु श्री नाथ जी का योग वाचक है । इस प्रकार ॐ कार पंच देबात्मक इसे
पंच ईश्वर , पंच महेश्वर कहा जाता है । इस प्रकार ॐ कार के प्रणव द्वारा
ब्रह्म जानने का साधन है कि जो है सत चित ब्रह्म ही है । इस का जप करने
से शब्द ब्रह्म से पर ब्रह्म तक जाकर मुक्ति प्राप्त होती है । इस शब्द
ब्रह्म को नाद ब्रह्म , परा नाद , परा वाणी , कहते हैं जो मूलाधार चक्र
में स्थिति है । समाधि अवस्था में इस का अनुभव होता है । यहाँ नाथ
चिदानन्द स्वरूप और उस की शक्ति कुण्डलिनी को कहा है । जहाँ छः चक्र
जाग्रति होती है । योगी सभी विकल्प छोड़ कर निर्बिकल्प समाधि में जाता है
यह समाधि परा वाड़ी से भी परे है । जब तक ॐ स्वरूप परावाणी में नही उतरता
तब तक निर्बिकल्प समाधि लगाना कठिन है अत: इस परा वाणी को नाथ जी मानते
हैं । जिसे माहेश्वरी कहा है ।
--------------------------------------------------------घट पिंड में
चक्र - - - हम्हारे शरीर में कुल 28 चक्र होते हैं जिस में मुख्य षट चक्र
हैं ।
1.- मूलाधार चक्र - - गुदा स्थान चार पंखुरी का कमल , गणेशजी योगी सिद्धि
बुद्धि21600 अजपा जाप ।
2.- महापद्म चक्र - - बिन्दु स्थान (गुदा लिंग के बीच )जहाँ नील नाथ जी
योगी कुण्डलिनी शक्ति । अनन्त श्वास ।
3.- स्वाधीषठान चक्र - - लिंग स्थान छः पंखुरी का कमल , सत्य नाथ ब्रह्मा
जी योगी सावित्री शक्ति ।
4.- सुशुम्ना चक्र - - सुशुम्ना स्थान छः पंखुरी का कमल , तहां गँगा
जोगणि , शती शक्ति ।
5.- - गर्भ चक्र - - गर्भ स्थान सप्त पंखुरी का कमल , अग्नि देवता ।
6.- कुण्डलिनी चक्र - - कटि स्थान अष्ट पंखुरी का कमल यहाँ अग्नि देवता योगी ।
7.- मणिपुर चक्र - - नाभि स्थान दस पंखुरी का कमल , सन्तोष नाथ विष्णुजी
योगी लक्ष्मी शक्ति
8.- लिंग चक्र - - लिंग स्थान तहां रुद्र देवता
9.- अनहद चक्र - - हृदय स्थान 12 पंखुरी का कमल तहां महा देव योगी श्वेत
वर्ण उमा शक्ति ।
10.- बिशुद्धि चक्र - - कंठ स्थान 16 पंखुरी का कमल तहां हंस नाथ जी योगी
अविद्या शक्ति ।
11.- प्राण चक्र - - गल स्थान 32 पंखुरी का कमल , तहां प्राण नाथ जी योगी
और परम शक्ति
12.- अबल चक्र - - त्रि ग्रंथि स्थान ( ब्रह्मा , विष्णु , महेश मिलन
स्थान )बत्तीस पंखुरी का कमल यहाँ ब्रह्मा , विष्णु , महादेव त्रि देव
योगी त्रिय शक्ति अरुण छोत प्रभा का वर्ण ।
13.- चिबुक चक्र - - चिबुक स्थान 34 पंखुरी का कमल , प्राण देवता योगी
सरस्वती शक्ति ।
14.- बलवान चक्र - - नासिका स्थान (ईडा , पिंगला , सुशुम्ना मिलन ) त्रि
पंखुरी का कमल , प्रणव नाथ योगी , सुशुम्ना शक्ति ।
15.- कर्ण मूल चक्र - - कान तले स्थान , 36 पंखुरी का कमल जहाँ नाद देवता
योगी श्रुति शक्ति ।
16.- आज्ञा चक्र भ्रू स्थान द्वि पंखुरी का कमल जहाँ आदि नाथ जी योगी ,
ज्ञान शक्ति ।
17.- त्रिवेणी चक्र - - भ्रुमध्य के ऊपर , 26 पंखुरी का कमल जहाँ आकास
देवता योगी ।
18.- चंद्र चक्र - - भाल स्थान 32 पंखुरी का कमल , तहां चन्द्र देवता
योगी अमृत आमद शक्ति
19.- अमृत चक्र - - भाल के ऊपरी स्थान चन्द्र देवता योगी
20.- ब्रह्म द्वार चक्र - - भाल के ऊपरी स्थान 100 पंखुरी का कमल तहां
ब्रह्म नाथ योगी
21.- अकुल चक्र - - भाल के ऊपरी स्थान छः सौ पंखुरी का कमल जहाँ बासुकीनाथ देवता ।
22.- ब्रह्म रंध्र गुफा चक्र - - मुर्धास्थान सहत्र पंखुरी का कमल , गुरु
गोरखनाथ जी योगी अनुपम योगी ।
23.- तालु चक्र भँवर गुफा - - (उर्धरन्ध्र ) तालिका स्थान 64 पंखुरी का
कमल , तहां श्री शंभू जती गुरु गोरखनाथ जी योगी । सिद्धान्त शक्ति ।
24.- अलक्ष (बल )चक्र - - भ्रमर गुफा स्थान एक हजार पंखुरी का कमल , यहाँ
अलक्ष नाथ योगी अद्भुत बरनी महा माया शक्ति , महा विष्णु का स्थान ।
25.- पुण्यगार चक्र - - भ्रमर गुफा ऊपरी स्थान एक हजार पंखुरी का कमल
जहाँ अकल नाथ जी योगी अकलेश्वरी शक्ति ।
26.- कोल हाट परम शून्य चक्र - - शिखा मंडल स्थान अनन्त नाथ योगी , अनन्त
शक्ति प्रकास ।
27.- वज्र दण्ड चक्र - - निरालम्ब स्थान , तहां महा विशाल तेज पुंज प्रभा ।
28.- असंख्य चक्र - - निरालम्ब स्थान असंख पंखुरी का कमल यहाँ असंख्य
योगी , असंख्य बरनी असंख्य शक्ति , शुद्ध प्रकासी , असंख्य गुरु उच्च
स्थान ।
जय श्री आदि नाथ जी । ।
ओह्म सोहं - - - ॐ कार ब्रह्म रुप है तन्त्र में इस के बिन्दु का अर्थ
शिव है । पृथ्वी बीज का अर्थ शक्ति है । जिस पृथ्वी में पाँचों तत्त्व
अपने बीज सहित विद्यमान हैं , जिस में लँ बीज पृथ्वी का , वँ बीज जल का ,
रँ बीज अग्नि का , यँ बीज वायु का और हं बीज आकाश का और ये पाँचों बीज ॐ
कार से अभेद हैं । और घट , पिंड और ब्रह्मांड पाँच तत्त्व से ही अभेद है
। अत: ॐ से चिद रूपा शक्ति अभेद है । शक्ति का सम्बंध परम्परा शक्ति से
रहता है । यहाँ पीर आचार्य का सम्बंध प्रणव के बाक्यार्थ से है । नाथ
तत्त्व का सम्बन्ध प्रणव के लक्यार्थ से है , लक्ष्यारथ का सम्बन्ध , महा
बिन्दु से है , महा बिन्दु का सम्बन्ध परा नाद से है , परा नाद का
सम्बन्ध ॐ कार से है , ॐ कार का सम्बन्ध ओह्म सोहं अजपा मन्त्र से है ।

भस्म गायत्री
- - - - - - - - - - - -
ॐ गुरुजी बभूत माता बभूत पिता , बभूत तरण तारणी , । मानुस से देवता करें
बभूत कष्ट निवारणी । सो भस्मति माता जहाँ पाई वही रमाई आदि के योगी अनाद
की बभूत सत के जाती धर्म का पुत । अमृत झरे धरती फरे , सो फल मात्रा
गायत्री चर । गायत्री माता गोबरी करि सूरज मुख सुखी अगिन मुख ज़री । अष्ट
टंक बभूत नव टंक पाड़ी , ईश्वर आणि पार्वती छाणी सो भसमति हस्तक लें मस्तक
चढ़ी । चढ़ी बभूत दिल हुआ पाक , अलख निरंजन आप ही आप । श्री गुरु जी आदेश
इसके बाद योगेश्वर भगवा बाना पहनते हैं
भगवा बाना मन्त्र से भगवा बाना पहनती हैं ।
मंत्र है ।
ॐ गुरु जी ॐ सोहं का धुन्धुकारा शिव शक्ति ने किया पसारा , नख से चीर भग
बनया - - रक्त रुप से भगवा आया । अलख पुरुष ने धारण किया पीछे सिद्धों का
दिना । आओ सिद्धों धरो ध्यान , भगवा मन्त्र भया प्रणाम । ॐ गुरु जी नाथ
जी को आदेश आदेश